बाल्यावस्था कीमत शीर्षक की इस कहानी से जानें विनयवान होने का महत्व। राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…
इंदौर। महान व्यक्ति का बचपन उनके गूढ़ व्यक्तित्व का परिचायक होता है। बाल्यकाल में राजेन्द्र (आचार्यश्री) अपने सहपाठी के साथ स्कूल में अध्ययनरत थे। किसी धूल भरे स्थान में कक्षा लगनी थी। राजेन्द्र ने पुस्तक सिर पर रखी, स्वयं धूल में बैठ गए। वहीं एक छात्र ने अपने बस्ते को जमीन पर रखा और शर्ट-पेन्ट खराब ना हो जाए, इसीलिए अपने बस्ते पर जाकर बैठ गया।
अध्यापक ने दोनों छात्रों को देखा राजेन्द्र से पूछा – आपने इन पुस्तकों को सिर के ऊपर क्यों रखा और स्वयं बैठे हो धूल में?? राजेन्द्र के श्रीमुख से सहसा निकल पड़ा – मैं तो जब जन्मा था तब भी धूल पर ही गिरा था और जब मृत्यु होगी तो धूल पर ही छोड़ा जाऊंगा। मेरी कीमत न तब थी, न अब है, न आगे रहेगी। जिससे मेरी कीमत होगी उसे मैं सिर पर रखे हूं।अध्यापक जी राजेन्द्र की बात सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए। सत्य है!! विनयवान ही विद्यावारिधि होते हैं।।













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