Through_devotion_to_Lord_Arihant,_the_soul_transforms_into_the_Supreme_Soul_(Paramatma)

सारांशः-

सीकर। 16 कारण भावना में आज अरिहंत भक्ति का दिवस है। जिन भक्ति से मुक्ति मिलती है। 46 मूलगुण धारी भगवान की भक्ति की जाती है। भगवान की देशना, सुनना और मानना भी चाहिए। यह प्रवचन आचार्य श्री के शिष्य मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने दंग की नसिया श्री आचार्य धर्मसागर सभागृह में दिए। उन्होंने कहा कि भगवान की सुनने से मान चला जाता है। विनय और नम्रता आत्मा के गुण मिलते हैं। यह शरीर नश्वर है जबकि आत्मा अजर अमर है आपने आत्मा को शरीर का नौकर बना लिया है। राग द्वेष विषय भोग, कषाय के कारण आप संसार में परिभ्रमण कर रहे हैं। डॉ. राजेश पंचोलिया के अनुसार मुनि श्री ने आगे बताया कि अरिहंत भक्ति निज चेतन की भक्ति है,प्रत्येक आत्मा को परमात्मा बनने की शक्ति अरिहंत भक्ति से मिलती है।

पूज्य जिनवाणी और जनवाणी का अंतर समझना हितकारी

मुनिश्री ने अनेक प्राचीन आचार्य की कथा के माध्यम से बताया कि आचार्य समंतभद्र ने भगवान की भक्ति अटूट श्रद्धा के साथ की उन्होंने 24 भगवान के स्मरण करते हुए जैसे ही आठवी तीर्थंकर चंद्र प्रभु भगवान का स्मरण किया। पत्थर टूटकर उसे भगवान चंद्र प्रभु प्रकट हुए उसके प्रभाव से पूरा नगर धार्मिक हो गया। गणधर स्वामी, केवली, श्रुत केवली ने भगवान की देशना को स्मरण शक्ति से, ताड़ पत्रों ,हस्त लिखित शास्त्रों में लिपिबद्ध किया। भगवान की वाणी आगम और जिनवाणी है। आत्मा की उन्नति के लिए पूज्य जिनवाणी और जनवाणी का अंतर समझना हितकारी है।

दान योग्य और सुपात्र को देना चाहिए

मुनि यशोधर की कथा से बताया कि मुनि श्री ने उपसर्ग करने वाले और उपसर्ग दूर करने वाले दोनों को एक समान आशीर्वाद दिया। अरिहंत भगवान वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी होते हैं। शास्त्रदान के महत्व में बताया कि एक ग्वाल ने मुनिराज को धार्मिक ग्रंथ दिया तो वह अगले भव में कुंदकुंद आचार्य हो गए। दान योग्य और सुपात्र को देना चाहिए।