Dashalakshan_Parva_A_Grand_Festival_of_Spiritual_Progress

जैन धर्म में पर्व केवल उत्सव मनाने का नाम नहीं है, बल्कि वे आत्मा को जगाने, कर्मों की निर्जरा करने और अपने स्वरूप की ओर लौटने के पावन अवसर हैं। इन्हीं में दशलक्षण पर्व दिगम्बर जैन परम्परा का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं आध्यात्मिक पर्व है। यह पर्व हमें बाहरी संसार से दृष्टि हटाकर अपने अंतर्मन और आत्मस्वरूप में प्रवेश करने की प्रेरणा देता है। वर्ष 2026 में दशलक्षण पर्व 15 सितंबर से 25 सितंबर तक मनाया जाएगा। इस वर्ष तिथियों के क्रम में एक दिन की वृद्धि होने के कारण पर्व की अवधि विशेष रूप से ग्यारह दिनों की होगी। इससे पूर्व 13 सितंबर को रोट तीज का त्योहार मनाया जाएगा । 21 सितम्बर को सुगंध दशमी तथा 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के अवसर पर दशलक्षण धर्म की साधना का विशेष आध्यात्मिक वातावरण रहेगा। इसके पश्चात 27 सितंबर को क्षमावाणी पर्व प्रेम, मैत्री, सद्भाव और परस्पर क्षमायाचना के रूप में मनाया जाएगा। दिगम्बर जैन दर्शन में इन दस धर्मों को केवल दस सद्गुण नहीं, बल्कि आत्मा के स्वभाव की ओर लौटने वाली साधना माना गया है। उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्यकृये दस धर्म आत्मा को कषायों से दूर कर उसके निर्मल स्वरूप की अनुभूति की दिशा में ले जाते हैं।

दस धर्म-दस आत्म-जागरण के सोपान

पंडित द्यानतराय जी ने इन दस धर्मों को अत्यंत सहज एवं गहन आध्यात्मिक भाव से कहा है-

उत्तम छिमा जहाँ मन होई, अन्तर-बाहिर शत्रु न कोई।

उत्तम मार्दव विनय प्रकासे, नाना भेद ज्ञान सब भासे॥

उत्तम आर्जव कपट मिटावे, दुरगति त्यागि सुगति उपजावे।

उत्तम शौच लोभ-परिहारी, सन्तोषी गुण-रतन भण्डारी॥

उत्तम सत्य-वचन मुख बोले, सो प्रानी संसार न डोले।

उत्तम संजम पाले ज्ञाता, नर-भव सफल करै, ले साता॥

उत्तम तप निरवांछित पाले, सो नर करम-शत्रु को टाले।

उत्तम त्याग करे जो कोई, भोगभूमि-सुर-शिवसुख होई॥

उत्तम आकिंचन व्रत धारे, परम समाधि दशा विसतारे।

उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावे, नर-सुर सहित मुक्ति-फल पावे॥

मूल रूप से आचार्य उमास्वामीकृत तत्त्वार्थसूत्र के नौवें अध्याय में रू-

‘उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः’ कहकर इसका व्यवस्थित सैद्धांतिक निरूपण किया गया है

आचार्य समंतभद्र द्वारा रचित प्रमुख श्रावकाचार ग्रंथ में मुनियों के लिए इन दस धर्मों को पूर्ण रूप से और श्रावकों के लिए आंशिक रूप से पालने का निर्देश है-

क्षमामार्दवमार्जव शौचं सत्यं च संयमस्तपः।

त्यागोऽकिंचन्यमपि च ब्रह्मचर्यं च तद्गुणाः॥

दशलक्षण पर्व में होती है आत्म-साधना

इन दिनों दिगम्बर जैन समाज में जिनालयों में प्रातःकाल से ही भक्ति और साधना का वातावरण निर्मित हो जाता है। श्रद्धालु भगवान के अभिषेक एवं शांतिधारा के साथ पूजन-विधान करते हैं। अनेक श्रावक-श्राविकाएँ उपवास, एकासन, रस-परित्याग, स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण एवं अन्य तप-साधनाओं के माध्यम से आत्मशुद्धि का प्रयास करते हैं। मंदिरों में धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। सुगंध दशमी ( 21 सितम्बर) के अवसर पर धर्ममय झांकियों एवं धार्मिक प्रस्तुतियों के माध्यम से जिनवाणी और धर्म के संदेश को जन-जन तक पहुंचाया जाता है। अनंत चतुर्दशी ( 25 सितम्बर ) दशलक्षण पर्व की साधना का अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन अनेक श्रावक-श्राविकाएँ उपवास एवं विशेष धार्मिक साधना करते हैं। जिनालयों में विशेष अभिषेक, पूजन और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है। वातावरण में भक्ति के साथ-साथ त्याग, तप, संयम और आत्मचिंतन की भावना दिखाई देती है। वास्तव में दशलक्षण पर्व का सच्चा सौंदर्य मंदिरों की सजावट में नहीं, बल्कि जब क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनय, कपट के स्थान पर सरलता, लोभ के स्थान पर संतोष और विषयासक्ति के स्थान पर आत्मचिंतन का जन्म हो-तभी दशलक्षण पर्व सार्थक होता है।

क्षमावाणी पर्व- क्षमा से मैत्री की ओर

दशलक्षण पर्व की साधना के पश्चात आता है क्षमावाणी पर्व, जो जैन जीवन-दर्शन में आत्मशुद्धि की भावना को और अधिक पूर्णता प्रदान करता है। दिगम्बर जैन परम्परा में क्षमावाणी पर्व दशलक्षण पर्व के पश्चात मनाया जाता है। वर्ष 2026 में क्षमावाणी पर्व 27 सितंबर को मनाया जाएगा। क्षमावाणी केवल एक-दूसरे से औपचारिक रूप से क्षमा मांगने का दिन नहीं, बल्कि अपने भीतर संचित क्रोध, मान, माया, लोभ, वैर और द्वेष को विसर्जित करने का आध्यात्मिक अवसर है। क्षमावाणी को कई स्थानों पर “पड़वा धोक” की परम्परा से भी जोड़ा जाता है। परस्पर मिलकर क्षमा मांगना, बड़े-बुजुर्गों को जय जिनेंद्र,वंदन, नमन करना तथा प्रेम और सद्भाव के साथ खोपरा-मिश्री खिलाना इस पर्व की आत्मीय परम्पराओं में शामिल है। उत्तम क्षमा से उत्तम ब्रह्मचर्य तक-दस धर्म हमारे जीवन में उतरें और आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप की ओर अग्रसर हो।