इंदौर। इंद्रपुरी चातुर्मास उत्सव समिति के तत्वावधान में नेमिनगर जैन कॉलोनी में इन दिनों भक्ति, आध्यात्म और धर्म का महासागर हिलोरे ले रहा है। यहां विराजित प्राकृताचार्य श्री सुनीलसागर जी ससंघ के सानिध्य में गुरु भक्त रोजाना आचार्यश्री के मुखारविंद से मंगल प्रवचन के माध्यम से अमृतवाणी का रसपान कर रहे हैं। सोमवार को भी यहां आचार्यश्री सुनीलसागर जी महाराज ने मंगलाचरण उपरांत अपने प्रवचन में जन्म-मरण, धर्म और कर्म की विशद व्याख्या की है। उन्होंने प्रवचन में कहा कि सबके अपने-अपने कर्म है। दो बच्चे एक साथ जन्म लेते हैं। दोनों के जन्म के समय में अंतर होता है। एक हवाई जहाज दुर्घटना में एक साथ कई लोग मारे जाते हैं, लेकिन सबकी सांस निकलने का समय भी अलग-अलग होता है। जब जन्म और मरण का समय अलग है तो यह सब कर्मों का ही फल है।

यह इंदौर वासियों का सौभाग्य है

आचार्यश्री ने कहा कि सुख-दुख तो अपना भोगना ही है। मां अपने बेटे की बीमारी से दुखी है और बेटा अपनी बीमारी से। मां को राग है तो उसकी आंख में आंसू हैं। एक मुनि राग से रहित हैं। जहां राग चला जाता है तो फिर आंख में आंसू नहीं आ सकते। धर्मात्मा श्रावक की आंख में भले ही आंसू आ जाए, लेकिन साधु के आंख में कभी आंसू नहीं आ सकते। अंतराय हो जाए तब भी नहीं। उन्होंने अंतराय का उदाहरण देते हुए एक प्रसंग भी सुनाया। आचार्य श्री ने कहा कि यह इंदौर वासियों का सौभाग्य है कि यहां एक आवाज लगाओ तो एक लाख जैन उठ खड़े होंगे। उन्होंने प्रवचन में आगे कहा कि भीतर की श्रद्धा कुछ नहीं देखती। वह केवल भक्ति ही देखती है।

ताश के पत्तों से भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है

उन्होंने कर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि कर्मों के अपने-अपने परिणाम हैं। परिणाम सबके अपने-अपने हैं।परिणाम का फल मिलता है। आचार्यश्री ने कहा कि एक डाली में दो फूल हैं। एक फूल मंदिर में भगवान के चरणों में चला गया तो दूसरा अर्थी पर। यह कर्मों के परिणाम ही हैं। ज्यादा दूसरों की वकालत में मत पड़ो। इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा। जब हम ही सुधर जाएंगे ना तो जग सुधर जाएगा। उन्होंने ताश के 13 पत्तों के माध्यम से ज्ञान पाने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्य यदि चाहे तो ताश के पत्तों से भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

धृतराष्ट्र और कृष्ण का प्रसंग सुनाया

आचार्य श्री ने कहा कि एक मनुष्य जीव ही कर्म कर सकता है। वही संसार में जन्म भी एक ही लेता है। आचार्य श्री ने कर्मों के फल के बारे में बताते हुए धृतराष्ट्र और कृष्ण का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि पूर्व भवों के कर्मों के कारण ही उन्हें नेत्रहीन होना पड़ा और अपने 100 संतानों का वियोग झेलना पड़ा।

मंगलाचरण माताजी ने किया

प्रवचन से पूर्व मंगलाचरण दृढ़मति माताजी ने किया। साथ ही माताजी के प्रवचन भी हुए। इस अवसर पर इंद्रपुरी चातुर्मास उत्सव समिति के इंद्रकुमार सेठी, नेमिनगर जैन कॉलोनी मंदिर समिति के अध्यक्ष कैलाश लुहाड़िया, कुशलराज जैन पमपम, प्रदीप पाटोदी, देवेंद्र सेठी सहित बड़ी संख्या में समाजजन और महिलाएं मौजूद रहीं।