दिल्ली। ऋषभोदय में विराजित दिगम्बर जैन पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्मसभा में स्वस्थ जीवन, विवेकपूर्ण निर्णय, कर्म सिद्धांत, शुद्ध आहार और विश्व मैत्री का संदेश दिया। महाराजश्री ने कहा कि जीवन में सुख और शांति चाहते हैं तो भ्रम से बचना, विचारपूर्वक निर्णय लेना और अपने आहार-विहार को संयमित रखना आवश्यक है।

जैन धर्म अनादि सनातन

पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि जैन धर्म अनादि सनातन है। दिगम्बर मुनियों ने अनादि काल से इसकी परंपरा को पुष्ट किया है। यह धर्म पहले भी था, आज भी है और आगे भी बना रहेगा।

देखो, समझो फिर निर्णय करो

महाराजश्री ने कहा कि जीवन में किसी भी विषय पर अधूरी बात सुनकर या अचानक कोई दृश्य देखकर निर्णय नहीं करना चाहिए। कई बार देखा हुआ और सुना हुआ भी पूर्ण सत्य नहीं होता। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूर्वापर विचार, चिंतन और मंथन आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि दुनिया में हुए, हो रहे और भविष्य में होने वाले अनेक अनर्थों का मूल कारण भ्रम है। शंका भी शस्त्र के समान खतरनाक हो सकती है। इसलिए बात को ठीक से सुनें, समझें और विचार करने के बाद ही निर्णय लें।

गिरो मन, गिराओ मत

महाराजश्री ने कहा कि यदि जीवन में कोई व्यक्ति पीड़ा या कष्ट देता है तो उससे बदला लेने की भावना नहीं रखनी चाहिए। कर्म निष्पक्ष है और किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। व्यक्ति जैसा कर्म करता है, उसे उसी के अनुरूप फल प्राप्त होता है।

उन्होंने कहा कि कषाय के वेग और विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को संभालना चाहिए। न स्वयं गिरें और न किसी को गिराएं। किसी को नीचे गिराकर ऊपर उठना वास्तविक सफलता नहीं है। अपनी योग्यता और पुरुषार्थ से आगे बढ़ना ही श्रेष्ठ मार्ग है।

शुद्ध खाओ, शुद्ध भाषण करो

स्वस्थ और सुखी जीवन के लिए शुद्ध एवं शाकाहारी भोजन को आवश्यक बताते हुए महाराजश्री ने कहा कि भोजन का प्रभाव व्यक्ति के भाव, विचार और वाणी पर पड़ता है। जैसा अन्न होगा, वैसा मन और जैसा पानी होगा, वैसी वाणी बनने की संभावना रहती है।

उन्होंने कहा कि विचार और आचरण को पवित्र रखना है तो भोजन शुद्ध, सात्विक और अल्प होना चाहिए। उचित समय पर ग्रहण किया गया भोजन हितकारी होता है, जबकि असमय भोजन स्वास्थ्य के लिए कष्टकारी और प्रमाद बढ़ाने वाला हो सकता है।

महाराजश्री ने कहा कि भोजन में स्वाद के साथ स्वच्छता, स्वास्थ्य, पवित्रता और उत्साह का भी ध्यान रखना चाहिए। शाकाहार को मानवता की पहचान बताते हुए उन्होंने इसे मानव के लिए श्रेष्ठ आहार बताया।

संग्राम नहीं, समझौता करो

महाराजश्री ने कहा कि जीवन में शांति चाहिए तो संघर्ष और श्रम जरूर करें, लेकिन युद्ध और शत्रुता का मार्ग न अपनाएं। शत्रुता से शत्रुता बढ़ती है, जबकि मित्रता से मित्रता का विस्तार होता है।

उन्होंने समता भाव धारण करने और मैत्री भावना रखने की प्रेरणा देते हुए कहा कि क्षमा के माध्यम से ही विश्व को मैत्री के सूत्र में बांधा जा सकता है। “जियो और जीने दो” की भावना को जीवन में उतारना चाहिए।

अधिकार के साथ कर्तव्य भी जरूरी

महाराजश्री ने कहा कि जीवन में अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने के साथ कर्तव्यों का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है। यदि जीना हमारा अधिकार है तो दूसरों को जीने देना हमारा कर्तव्य है। समता, क्षमा, मैत्री और संयम से ही समाज में शांति स्थापित हो सकती है।