धरियावद। 48 दिवसीय भक्तामर महामंडल विधान के दौरान 16 कारण पर्व के अंतर्गत आज आचार्य भक्ति भावना का दिवस मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से विधान में भाग लेकर आचार्य परमेष्ठी की आराधना की। प्रवचन में आचार्य कल्प पुण्यसागर जी महाराज ने आचार्य भक्ति के महत्व और आचार्य परमेष्ठी के गुणों पर विस्तार से प्रकाश डाला। आचार्यश्री ने कहा कि नमोकार महामंत्र के तीसरे पद ‘णमो आयरियाणं’ के माध्यम से हम आचार्य भगवंतों का मंगल स्मरण करते हैं। आचार्य के बिना किसी भी व्यवस्था में अनुशासन कायम नहीं रह सकता। परिवार से लेकर समाज, राष्ट्र और धर्मसंघ तक व्यवस्था को मर्यादा में बनाए रखने का दायित्व आचार्य भगवंतों पर होता है। वे स्वयं पंचाचार का पालन करते हैं और शिष्यों को भी उसका पालन कराते हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य का अनुशासन बाहर से कठोर दिखाई दे सकता है, लेकिन उसके पीछे शिष्य के कल्याण की भावना होती है। जैसे माता-पिता बच्चे के हित में कभी प्यार से समझाते हैं और आवश्यकता पड़ने पर डांटते भी हैं, वैसे ही आचार्य शिष्यों को पहले प्रेम और हितकारी वाणी से समझाते हैं और बार-बार गलती होने पर कठोर अनुशासन भी करते हैं।

सिंह जैसा पराक्रम, समुद्र जैसी गंभीरता

आचार्यश्री ने आचार्य परमेष्ठी के गुणों को विभिन्न उपमाओं से समझाते हुए कहा कि आचार्य सिंह के समान पराक्रमी, हाथी के समान स्वाभिमानी, हिरण के समान सरल, पृथ्वी के समान कष्टसहिष्णु, चंद्रमा के समान शीतल और समुद्र के समान गंभीर होते हैं। परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हों, वे अपनी मर्यादा और संयम से विचलित नहीं होते। उन्होंने आचार्य धर्मसागर जी महाराज एवं आचार्य शिवसागर जी महाराज के जीवन प्रसंगों के माध्यम से बताया कि सच्चा आचार्य एक ओर अनुशासन में कठोर होता है, वहीं दूसरी ओर शिष्यों के प्रति उसके हृदय में अपार वात्सल्य और करुणा होती है।

आचार्य शांतिसागर महाराज ने पुनर्जीवित की दिगंबर परंपरा

आचार्यश्री ने कहा कि आचार्य शांतिसागर महाराज का दिगंबर जैन समाज पर महान उपकार है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों और अनेक उपसर्गों को सहन करते हुए दिगंबर साधु परंपरा को सुदृढ़ आधार दिया। उनके द्वारा दिए गए संस्कारों के कारण आज समाज में दान, पूजा, सेवा, स्वाध्याय, तप, संयम, विनय और प्रभावना की परंपरा निरंतर आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में दिखाई दे रही संत परंपरा और साधु-संतों की साधना उसी महान परंपरा की देन है। आचार्य शांतिसागर महाराज ने देव-शास्त्र-गुरु के संरक्षण के साथ समाधिमरण, चारित्र, अनुशासन, विनय, अपरिग्रह और ज्ञानोपयोग की साधना का मार्ग समाज को दिखाया।

गुरु भक्ति से बढ़ता है पुण्य, खुलता है मोक्ष का मार्ग

आचार्यश्री ने कहा कि सम्यक दृष्टि जीव आचार्य और गुरु भक्ति के बिना नहीं रह सकता। आचार्य भगवंतों की सेवा-वैयावृत्ति, आहारदान, ज्ञानदान, औषधदान और अभयदान के माध्यम से व्यक्ति अपने पाप कर्मों का क्षय करता है और पुण्य का संचय करता है। यही पुण्य और संस्कार आगे चलकर उसे संयम और साधना के मार्ग पर ले जाते हैं।

उन्होंने कहा कि आचार्य भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि गुरु के बताए मार्ग पर चलना ही सच्ची गुरु भक्ति है।

भक्तामर विधान में अब कम दिन शेष

प्रवचन के अंत में आचार्यश्री ने भक्तामर महामंडल विधान में अधिक से अधिक परिवारों से पुण्यार्जन करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि विधान के समापन में अब कुछ ही दिन शेष हैं और 17 सितंबर तक विधान चलेगा, इसलिए जिन परिवारों ने अभी तक पुण्यार्जन का अवसर नहीं लिया है, वे शीघ्र अपने नाम लिखाकर इस धार्मिक आयोजन का लाभ लें।