मुरैना। जैन उपासना स्थल बड़ा जैन मंदिर में चातुर्मासरत आचार्यश्री उदारसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए स्थितिकरण अंग की महत्ता समझाई। उन्होंने कहा कि उन्मार्ग की ओर जा रही आत्मा को पुनः सन्मार्ग पर स्थापित करना ही स्थितिकरण है। यह केवल दूसरों को धर्म में स्थिर करने का कार्य नहीं, बल्कि सबसे पहले स्वयं को धर्ममार्ग पर दृढ़ता से स्थापित करने का नाम है। आचार्यश्री ने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं धर्म के मार्ग पर स्थिर नहीं है, वह दूसरों को धर्म में कैसे स्थिर कर पाएगा। इसलिए साधक को पहले अपने जीवन में धर्म को उतारना चाहिए और अपने आचरण से उसका उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। इसके बाद साधर्मी के जीवन को धर्म में स्थिर करने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति आर्थिक परेशानी के कारण धर्म से विमुख हो रहा है और उसकी उचित सहायता कर उसे धर्ममार्ग पर बनाए रखा जाता है, तो यह भी स्थितिकरण है। इसी प्रकार प्रेमपूर्वक समझाना, अनुकूल उपदेश देना, सहयोग करना, वात्सल्य रखना और सही समय पर उचित मार्गदर्शन देना भी स्थितिकरण के ही रूप हैं। समाज में एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनने की भावना इसी धर्मभावना को मजबूत करती है।

पहले स्वयं का सुधार जरूरी

आचार्यश्री ने एक रोचक प्रसंग के माध्यम से आत्मसुधार का महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति डॉक्टर के पास पहुंचा। डॉक्टर ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें ठीक कर दूंगा।’’ मरीज ने पूछा, ‘‘डॉक्टर साहब, आपको इस बीमारी का बहुत ज्ञान है?’’ डॉक्टर ने कहा, ‘‘ज्ञान तो बहुत है, लेकिन यह बीमारी मुझे स्वयं कई वर्षों से है।’ आचार्यश्री ने कहा कि जब डॉक्टर स्वयं अपनी बीमारी से मुक्त नहीं हो पाया तो वह दूसरे को कैसे ठीक करेगा? ठीक इसी प्रकार जो व्यक्ति स्वयं धर्माचरण में स्थित नहीं है, उसका दूसरों को धर्म का उपदेश देना प्रभावकारी नहीं हो सकता। इसलिए दूसरों को सुधारने और धर्म में स्थिर करने से पहले अपने जीवन को धर्ममय बनाना आवश्यक है।

मुनिराज की चर्या समझे बिना निर्णय न लें

आचार्यश्री ने खजुराहो का एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक बार एक मुनिराज वहां पहुंचे। स्थानीय लोगों को उनकी चर्या समझ में नहीं आई। उन्होंने देखा कि मुनिराज शरीर पर पानी लगाते हैं और रात्रि में हरी घास पर लेटते हैं। लोगों को लगा कि संभवतः मुनिराज को कोई शारीरिक समस्या है और वे उन्हें वस्त्र पहनाने का प्रयास करने लगे। उस समय पंडित जगन्मोहन लाल शास्त्री जी ने लोगों से कहा कि पहले मुनिराज से उनकी वास्तविक आवश्यकता और स्थिति के बारे में समझना चाहिए। बिना पूरी बात जाने किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है। पहले उनकी चर्या को समझें, आवश्यकता को जानें और फिर समस्या हो तो उसके समाधान का प्रयास करें।

सही मार्गदर्शन देकर उसे धर्म में स्थिर रखना प्रत्येक श्रावक का दायित्व

इस प्रसंग के माध्यम से आचार्यश्री ने कहा कि स्थितिकरण का अर्थ केवल किसी को रोकना या उपदेश देना नहीं है। किसी व्यक्ति की स्थिति, परिस्थिति और वास्तविक समस्या को समझकर उसके अनुरूप उचित समाधान करना ही सच्चा स्थितिकरण है।

उन्होंने कहा कि धर्म से डिगते हुए व्यक्ति को तिरस्कार नहीं, सहारे की आवश्यकता होती है। उसे आलोचना नहीं, वात्सल्य और अनुकूल उपदेश चाहिए। साधर्मी के प्रति सहयोग, संवेदना, प्रेम और सही समय पर सही मार्गदर्शन देकर उसे धर्म में स्थिर रखना प्रत्येक श्रावक का दायित्व है। यही स्थितिकरण अंग की वास्तविक भावना है।