दिल्ली, ऋषभोदय। पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के परम भक्त वैभव जैन बडामलहरा जी ने बताया कि दिल्ली के ऋषभ विहार स्थित ऋषभोदय में विराजित दिगंबर जैन पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महामुनिराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए साधना और आत्मकल्याण का संदेश दिया।
साधना का यश स्वयं फैलता है
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि साधक को अपनी साधना में लीन रहना चाहिए। उसकी साधना का लोक में प्रचार-प्रसार स्वयं हो जाता है। जो व्यक्ति वास्तविक साधना करता है, उसका नाम अपने आप होता है। नाम चाहने से नाम नहीं मिलता, बल्कि पुण्य के उदय से यश स्वतः फैलता है।
जीवन क्षणभंगुर है
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत क्षणिक है। ओस की बूंद के समान आयु भी विनाशशील है। रूप और सौंदर्य भी हमेशा रहने वाले नहीं हैं। पलभर में क्या हो जाए, इसका किसी को पता नहीं। बीत चुकी घड़ी लौटकर नहीं आती, इसलिए समय रहते जीवन में अच्छे कार्य और आत्मकल्याण का पुरुषार्थ करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज किया गया पुरुषार्थ ही भविष्य में अच्छे भव का कारण बनता है। मनुष्य को अपने जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करते हुए धर्म और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
कषायों की अग्नि से बचें
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कषायों को अग्नि के समान बताते हुए कहा कि लोभ भी आग है, क्रोध ज्वाला है, मान अंगारा है और माया भी अग्नि है। राग, द्वेष और मोह भी मनुष्य के भीतर अशांति उत्पन्न करने वाली अग्नि हैं।
उन्होंने कहा कि चाहे चंदन की आग हो या बांस की, दोनों जलाती हैं। इसी प्रकार कषायों की अग्नि व्यक्ति के जीवन को जलाती रहती है। इससे बचने के लिए क्षमा रूपी नीर का सिंचन करना आवश्यक है।
भोगों में सुख नहीं, सुखाभास
मुनिश्री ने इंद्रिय विषयों और भोगों के संबंध में कहा कि भोगों में वास्तविक सुख नहीं होता, बल्कि वह केवल सुखाभास है। भोगों से प्राप्त होने वाला सुख क्षणिक और क्षणभंगुर होता है। इसलिए मनुष्य को क्षणिक सुख के पीछे भागने के बजाय स्थायी आत्मिक सुख की दिशा में पुरुषार्थ करना चाहिए।
आत्मकल्याण की ओर बढ़ें
धर्मसभा में दिए गए संदेश का केंद्र आत्मचिंतन, साधना और कषायों से मुक्ति रहा। मुनिश्री ने जीवन की नश्वरता को समझते हुए मनुष्य को समय रहते धर्म, संयम और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।



