पीठ। पर्युषण महापर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म की आराधना श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ की गई। प्रातः श्रीजी का अभिषेक, पूजन सहित धार्मिक क्रियाएं विधि-विधान से संपन्न हुईं। वहीं रात्रि में श्रीजी की आरती, प्रतिक्रमण और स्वाध्याय के माध्यम से श्रद्धालुओं ने धर्म आराधना की।

अष्टमी पर पुण्यार्जक परिवारों ने की विशेष आराधना

समाज अध्यक्ष राजकुमार डेचिया ने बताया कि अष्टमी के अवसर पर इंदू देवी-प्रवीण कोठारी, छाया-रोशन भूता, प्रियंका-कुलदीप कोठारी एवं पिंकी-कपिल भूता परिवार कार्यक्रम के पुण्यार्जक रहे।

इन्हीं पुण्यार्जक परिवारों को नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत स्वामी के मोक्ष कल्याणक पर निर्वाण लाडू अर्पित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इस अवसर पर लता, हार्दिक कोठारी एवं डॉ. चयांसी सहित समाजजन उपस्थित रहे।

‘लोभ का त्याग और संतोष का भाव ही शौच धर्म’

पंडित शैलेंद्र ने उत्तम शौच धर्म का महत्व समझाते हुए कहा कि यह जैन धर्म के दस धर्मों में चौथा धर्म है। यहां शौच का अर्थ केवल शरीर की स्वच्छता नहीं, बल्कि मन और आत्मा की पवित्रता तथा लोभ का त्याग है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य धन, वस्तुओं और सुख-सुविधाओं की इच्छाओं में जितना अधिक उलझता है, उसका असंतोष उतना ही बढ़ सकता है। उत्तम शौच धर्म लोभ, लालच और अत्यधिक संग्रह की भावना से बचकर संतोष अपनाने की प्रेरणा देता है।

जो उपलब्ध है, उसमें संतोष रखने का संदेश

उत्तम शौच धर्म का भाव है कि व्यक्ति जो उपलब्ध है उसमें संतुष्ट रहे, दूसरों की वस्तुओं के प्रति अनावश्यक लालसा न रखे और अपने विचारों एवं व्यवहार को निर्मल बनाए।

पंडित शैलेंद्र ने कहा कि बाहरी स्वच्छता के साथ मन के भीतर की शुद्धता पर ध्यान देना और इच्छाओं को नियंत्रित करना शौच धर्म को जीवन में उतारने की दिशा है।

पाठशाला के बच्चों ने दी रंगारंग प्रस्तुति

रात्रिकालीन कार्यक्रम में जयदू भारती जैन पाठशाला के विद्यार्थियों ने रंगारंग प्रस्तुतियां दीं। बच्चों की प्रस्तुतियों के माध्यम से पर्युषण महापर्व में धर्म-साधना के साथ नई पीढ़ी को धार्मिक संस्कारों से जोड़ने का प्रयास किया गया।