इंदौर। नेमी नगर जैन कॉलोनी में दशलक्षण महापर्व के चतुर्थ दिवस उत्तम शौच धर्म की आराधना के साथ भगवान पुष्पदंत स्वामी का निर्वाण कल्याणक श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भगवान के चरणों में निर्वाण लाडू अर्पित कर मंगल भावों के साथ निर्वाण कल्याणक मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके बाद गुरुदेव को जिनवाणी भेंट की गई तथा पाद प्रक्षालन किया गया। धार्मिक एवं आध्यात्मिक संदेश से ओतप्रोत ‘पाप का बाप कौन है’ विषय पर प्रेरणादायी नाटिका प्रस्तुत की गई, जिसने उपस्थित श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन का संदेश दिया। इस अवसर पर आचार्य श्री 108 सुनीलसागर जी गुरुदेव ने उत्तम शौच धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि जीवन में पाने की बेचौनी और खो देने का डर ही मनुष्य को अशांत करता है। सच्चा सौभाग्य उन्हीं के हृदय में बसता है, जिनका मन निर्मल होता है। जैसे सुई में वही धागा प्रवेश करता है, जिसमें गांठ नहीं होती, वैसे ही निर्मल हृदय में सद्गुणों का वास होता है।
उस चेतन को संवारना भूल जाते हैं, जिस पर परमात्मा की नजर होती है
गुरुदेव ने कहा कि दिखावे की इस दुनिया में बाहरी सुंदरता से अधिक आवश्यक आत्मा और आचरण की सुंदरता है। सीरत अच्छी नहीं है तो सूरत बेफिजूल है और जिसमें खुशबू नहीं, वह कागज का फूल है। इसलिए व्यक्ति को अपनी सोच और चरित्र को सुंदर बनाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोग उस तन को सजाने में लगे रहते हैं, जिस पर दुनिया की नजर होती है, लेकिन उस चेतन को संवारना भूल जाते हैं, जिस पर परमात्मा की नजर होती है। लोभ और शरीर के प्रति अत्यधिक आसक्ति से बचते हुए सरल जीवन अपनाना तथा अपने भीतर के चेतन को प्रकाशित करना ही उत्तम शौच धर्म की दिशा है।
दिन में शिविरार्थियों का स्वाध्याय हुआ
गुरुदेव ने कहा- मत फिसलो ऊपर की चिकनाई पर, चांदी का वर्क है गोबर की मिठाई पर। उन्होंने संदेश दिया कि बदलते दौर में व्यक्ति को अपनी पहचान नहीं खोनी चाहिए, क्योंकि सुंदर चेहरे से कहीं अधिक मूल्यवान सुंदर चरित्र होता है। दिन में शिविरार्थियों का स्वाध्याय हुआ। वहीं संध्याकालीन बेला में गुरुदेव की मंगलमय आरती के साथ धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिसमें श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से सहभागिता की। नृत्य-नाटिकाओं के माध्यम से धर्म एवं संस्कारों का सुंदर संदेश प्रस्तुत किया गया।
आज होगी उत्तम सत्य धर्म की आराधना
दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिवस उत्तम सत्य धर्म की आराधना की जाएगी। उत्तम सत्य का अर्थ केवल झूठ न बोलना नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म से ईमानदार रहना है। लोभ, भय, क्रोध या स्वार्थ के कारण असत्य का सहारा न लेना ही उत्तम सत्य धर्म है। सत्य सदैव मधुर, हितकारी और विवेकपूर्ण होना चाहिए। उत्तम सत्य हमें प्रेरणा देता है कि सत्य को केवल बोलें नहीं, अपने जीवन में जिएं।




