मुरैना में मुनिश्री विबोधसागरजी ने प्रवचन में कहा कि पर्युषण पर्व मन की मलिनता को दूर कर आत्मा को निर्मल बनाने का पर्व है। इस वर्ष पर्व 28 अगस्त से 6 सितंबर तक मनाया जाएगा और 8 सितंबर को क्षमावाणी पर्व होगा। पढ़िए मनोज जैन की ख़ास रिपोर्ट…

मुरैना के बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि पर्यूषण पर्व आत्मा की निर्मलता का प्रतीक है। यह पर्व केवल भक्ति और पूजन का ही नहीं, बल्कि तप, संयम और साधना का भी है। दसलक्षण धर्म आत्मा के दस सार्वभौमिक गुणों पर आधारित है, जिनका पालन करने से आत्मा की शुद्धि होती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग खुलता है।

दस दिवसीय कार्यक्रम :

• प्रतिदिन सुबह 6 बजे जलाभिषेक एवं शांतिधारा

• 7 बजे नित्य नियम पूजन एवं विशेष पूजन

• 7:30 बजे दसलक्षण विधान

• 9 बजे मुनिराजों के प्रवचन

• 10 बजे आहारचर्या

• 3 बजे तत्त्वार्थ सूत्र का वाचन

• 6:30 बजे शंका समाधान

• 7:30 बजे संगीतमय महाआरती

• 8 बजे शास्त्र सभा

• 8:40 बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम

धूप दशमी और अनंत चतुर्दशी का महत्व :

धूप दशमी पर सभी साधर्मी अग्नि में सुगंधित धूप समर्पित कर अष्टकर्मों के विनाश की प्रार्थना करते हैं। महिलाएं अपने पति की सुख-समृद्धि के लिए विशेष पूजन करती हैं। अनंत चतुर्दशी को प्रत्येक जैन परिवार पूजन, अभिषेक और व्रत कर जिनेंद्र प्रभु की आराधना करता है।

क्षमावाणी पर्व :

पर्युषण पर्व के समापन पर 8 सितंबर को क्षमावाणी पर्व मनाया जाएगा। इस दिन सभी जैन साधर्मी एक-दूसरे से क्षमा याचना करते हैं। यह पर्व हमें जीवन से बैरभाव मिटाकर विनम्रता और करुणा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

- जैन दर्शन में दया, करुणा और क्षमा का विशेष महत्व है। क्षमावाणी पर्व इसी जीवन दर्शन का वास्तविक स्वरूप है।