आगरा। निर्मल सेवा सदन, रकाबगंज-छीपीटोला में दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म के अवसर पर आत्मस्पंदन ध्यान शिविर श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ आयोजित हुआ। आचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री 108 समत्वसागर जी महाराज, मुनि श्री 108 शीलसागर जी महाराज एवं मुनि श्री 108 सुप्रभातसागर जी महाराज के सान्निध्य तथा पंडित प्रदीप शास्त्री दमोह के मार्गदर्शन में श्रद्धालुओं ने साधना की।

अभिषेक-शांतिधारा और संगीतमय विधान

शिविरार्थियों ने पूजन, अभिषेक एवं शांतिधारा में भक्तिभाव से सहभागिता की। इसके बाद दीप प्रज्ज्वलन, पाद प्रक्षालन, शास्त्र भेंट एवं मंगलाचरण हुआ। संगीतमय विधान के दौरान भजनों पर श्रद्धालुओं ने भक्तिमय प्रस्तुतियां दीं। दिनभर शिविर में साधना, अनुशासन और आत्मचिंतन का वातावरण बना रहा।

‘धर्म कर रहे हैं, फिर भी उसका आनंद क्यों नहीं मिल रहा?’

धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री समत्वसागर जी महाराज ने कहा कि पर्युषण के दिनों में लोगों की दिनचर्या बदल जाती है। सुबह से पूजा-पाठ और धार्मिक क्रियाएं शुरू हो जाती हैं, लेकिन व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न भी करना चाहिए कि इतना धर्म करने के बाद भी धर्म का फल माने जाने वाला आनंद और शांति जीवन में क्यों अनुभव नहीं हो रही है?

उन्होंने कहा कि धर्म की साधना से पहले व्यक्ति को अपने भीतर की मलिनता को पहचानना होगा। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायें मन को प्रभावित करती हैं। यदि भीतर कषाय बनी हुई है तो केवल बाहरी धार्मिक क्रियाओं से अपेक्षित आंतरिक परिवर्तन नहीं आता।

‘ऊपरी वृत्ति और मनोवृत्ति का अंतर ही माया’

मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति धार्मिक क्रियाएं तो करता है, लेकिन यदि उसकी बाहरी प्रवृत्ति और भीतर की मनोवृत्ति में अंतर है तो यह माया और छल की स्थिति है।

उन्होंने कहा कि अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग मुखौटे लगाकर जीना सरलता नहीं है। धर्मस्थल पर व्यवहार कुछ और और बाहर निकलते ही आचरण कुछ और हो जाए तो धर्म को जीवन में उतारने का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

‘दूसरे को छलने से पहले स्वयं छले जाते हैं’

मुनिश्री ने कहा कि जब व्यक्ति अपने विवेक का उपयोग बनावटीपन और छल में करता है तो वह केवल दूसरे को ही नहीं, स्वयं को भी छलता है। व्यापार, परिवार या सामाजिक जीवन में लाभ की इच्छा कई बार मन में लोभ और कुटिलता को जन्म देती है।

उन्होंने कहा कि धर्म की शुरुआत क्रोध, मान और कुटिलता को कम करने से होती है। छल, बनावटीपन और टेढ़ेपन को छोड़कर मन को सरल बनाने से जीवन में शांति और आनंद बढ़ता है।

‘सरल मन को कुछ छिपाने की आवश्यकता नहीं’

उत्तम आर्जव धर्म की व्याख्या करते हुए मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति को बाहरी रूप बदलने के बजाय अपने मन को सरल और ऋजु बनाने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में छल और कुटिलता अशांति को जन्म देते हैं।

उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति साधु जैसा जीवन नहीं अपना सकता, लेकिन साधु जीवन में दिखाई देने वाली शांति की अभिलाषा जरूर रखता है। उस शांति के लिए अपने व्यवहार से छल-कपट और कुटिलता को कम करना आवश्यक है।

‘टेढ़ापन जीवन में नुकसान ही देगा’

मुनि समत्वसागर जी ने कहा कि उत्तम आर्जव धर्म यही सिखाता है कि मन, वचन और कर्म में सरलता आए। व्यक्ति जब कुटिलता के साथ आगे बढ़ता है तो उसका विश्वास और सम्मान प्रभावित होता है। सरलता और निष्कपटता जीवन को सहज बनाने की दिशा देती है। कार्यक्रम का संचालन सतेंद्र जैन साहूला ने किया।

समिति और समाजजनों की रही सहभागिता

इस अवसर पर श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के रमेश जैन, मनोज जैन, मुकेश जैन, प्रवीण जैन पद्मावती, शैलेश जैन, मुकेश जैन लले, विवेक जैन, चक्रेश जैन, राजीव जैन, आशीष जैन बाबा, सतेंद्र जैन साहूला, दीपक जैन, रोहित जैन, मीडिया प्रभारी राहुल जैन सहित सकल जैन समाज के श्रद्धालु उपस्थित रहे।

मीडिया प्रभारी राहुल जैन ने बताया कि 19 सितंबर को प्रातः 7 बजे मुनि संघ के सान्निध्य में निर्मल सेवा सदन, छीपीटोला में दशलक्षण महापर्व के अगले धर्म की आराधना के अंतर्गत अभिषेक, पूजन एवं विधान होगा।