दिल्ली ऋषभ विहार। ऋषभोदय ऋषभ विहार में विराजित पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने धर्म-सभा में संबोधन करते हुए कहा कि सबके दिन एकसे नहीं होते। मित्रों। जीवन में इस सूत्र को कभी नहीं भूलना कि-सबके दिन एक-से नहीं होते। जहाँ कभी महल थे, वर्तमान में वहाँ, खंडहर पड़े हैं। जहाँ श्मशान थे वहाँ आज घर, मंदिर, भवन बने हैं। जो कभी सम्राट थे, वे पद से हट गए और जो कभी सेवक थे वे सेठ (धनिक) बन गए। जिनकी कभी पूजा होती थी, उनको आज कोई पूछ भी नहीं रहा है। जेल का उद्घाटन करने वाले भी जेल चले जाते हैं। घड़ी का कांटा कभी बारह पर होता है, तो कभी वही कांटा छह पर होता है। कभी शाम, कभी प्रातः कभी अंधकार तो कभी उजास (प्रकाश)। कभी घी घणा, कभी सुट्ठी भर चना।
दिन बदलते देर नहीं लगती।
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी के परम भक्त वैभव जैन बडामलहरा ने बताया कि आचार्यश्री ने आगे कहा कि संकटों में धैर्य रखो। संकट के दिन भी सदा नहीं रहते, सुख के दिन भी सदा नहीं रहते। कष्ट में फूलो मत, सुख में फूलो मन । सब दिन एकसे नहीं होते, सबके दिन एक से नहीं होते। दिन बदलते देर नहीं लगती। जीवन में सुखी रहना चाहते हो, अपना कल्याण करना है, तो करो, सुई का काम सीखो। कैंची मत बनो अर्थात काटने का काम मत करो अर्थात् जोड़ने का काम करो। तोड़ो मत, जोड़ना सीखो। किसी को गिराओ मत, उठाने का प्रयास करो। किसी का तिरस्कार मत करो, यथा-योग्य सबका सत्कार करो।
जब तक द्रव्य (धन) पर दृष्टि है तब तक कुछ नहीं
उन्होंने कहा कि द्रव्य-दृष्टि महान् होती है। एक मां दुग्ध में घृत को देख लेती है, एक कृषक बीज में वृक्ष देख लेता है, एक शिल्पकार पाषाण में प्रतिमा देख लेता है, एक कुम्भकार मिट्टी में मटकी देख लेता है, एक योगी (साधक) आत्मा में परमात्मा को देख लेता है। यही द्रव्य दृष्टि है। द्रव्य दृष्टि के बिना आटे से रोटी भी नहीं बनती है। आत्मा से परमात्मा बनना है, तो द्रव्य-दृष्टि से निहारो। जब तक द्रव्य (धन) पर दृष्टि है, तब-तक दुच्य (आत्मा) पर दृष्टि नहीं जा सकती है। आत्म-दृष्टि ही सर्वश्रेष्ठ है।
गुरु के दर्शन होते ही व्यक्ति आह्लाद से भर जाता है
आचार्य श्री ने कहा कि आकृतियों का मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। चित्र देवसीयत देखते ही चित्त प्रभावित होता है। अपने घरों में, भवनों में ऐसे चित्र लगाओ जिससे मन वैराग्य, दया, करुणा, विनय से भर जाए। प्रभु की प्रतिमा देखते ही हाथ जुड़ जाते हैं, गुरु के दर्शन होते ही व्यक्ति आह्लाद से भर जाता है। एक चित्र वैराग्य बढ़ाता है, एक चित्र बाब वासना जाग्रत कर देता है। अपने आपको हीन मानना, कमजोर मानना ही अविद्या है। यथार्थ को नहीं पहचानना भी अज्ञान है। अविद्या से अपनी रक्षा करो, विद्या (ज्ञान) का प्रयोग करो, विद्या- रथ पर आरूढ़ होकर आगे बढ़ो। विद्या से विनय प्राप्त होती है। विनय सुख शान्ति का आधार है।



