नांद्रे। नांद्रे की श्राविका सौ. लतिका सुकुमार चौधरी जी ने 21 अगस्त 2026 को दोपहर 1:55 बजे यमसल्लेखना पूर्वक समाधि धारण की। जैन परंपरा में सल्लेखना को आत्मसंयम, वैराग्य और शांत भावों के साथ जीवन के अंतिम चरण को साधने की आध्यात्मिक साधना के रूप में देखा जाता है।
11 माह पूर्व धारण किए सल्लेखना के नियम
सौ. लतिका सुकुमार चौधरी जी ने 11 माह पूर्व मुनि श्री सारस्वतसागर महाराज जी से सल्लेखना के नियम धारण किए थे। उन्होंने सभी प्रकार के फलों का आजीवन त्याग किया। विगत 31 दिनों से उन्होंने अन्न का पूर्णतः त्याग कर रखा था। समाधि से दो दिन पूर्व उन्होंने यमसल्लेखना धारण की और उत्कृष्ट समाधि को प्राप्त किया।
संतों एवं माताजी का मिला आशीर्वाद
लतिका चौधरी जी की समाधि गणाधिपति गणधराचार्य कुंथुसागर जी महाराज, चर्याशिरोमणि पट्टाचार्य विशुद्धसागर जी महाराज, आचार्य जिनसेन जी महाराज, आचार्य चंद्रप्रभसागर जी महाराज, आचार्य विद्यासागर जी महाराज, मुनि श्री सर्वार्थसागर जी महाराज, मुनि श्री सारस्वतसागर जी महाराज, मुनि चंद्रकीर्ति जी महाराज, क्षुल्लक श्रुतसागर महाराज, आर्यिका निष्काममती माताजी, आर्यिका गुरुवाणी माताजी, प.पू. जिनसेन भट्टारक महास्वामीजी एवं प.पू. लक्ष्मीसेन भट्टारक महास्वामीजी सहित संतों एवं माताजी के आशीर्वाद से हुई।
मुनि श्री सारस्वतसागर महाराज को माना गुरु
समाधि से पूर्व सौ. लतिका सुकुमार चौधरी जी ने अपने परिवारजनों से कहा कि जब से मुनि श्री सारस्वतसागर महाराज जी नांद्रे चातुर्मास के लिए आए हैं, तब से उन्होंने उन्हें अपना गुरु माना है।
उन्होंने परिवारजनों से यह भी कहा कि उनके सल्लेखना पूर्वक समाधि मरण होने के बाद उनके गुरुवर मुनि श्री सारस्वतसागर महाराज जी को इसकी सूचना दी जाए।
परिवारजनों ने निभाया साथ
सौ. लतिका सुकुमार चौधरी जी के परिवार में उनके पति सुकुमार चौधरी, पुत्र दिलीप, पुत्रियां शैलजा पाटील एवं सुजाता पाटील, बहू कविता चौधरी तथा पोती आदिती चौधरी हैं। परिवारजनों ने उनके अंतिम साधना काल में साथ रहते हुए धार्मिक भावों के साथ सहयोग किया।
संयम और आत्मसाधना की प्रेरणा
लतिका चौधरी जी की सल्लेखना पूर्वक समाधि उनके संयम, त्याग और आत्मसाधना की भावना को सामने रखती है। लंबे समय तक आहार का त्याग करते हुए उन्होंने धार्मिक नियमों का पालन किया और अंतिम समय में भी गुरु के प्रति श्रद्धा एवं आध्यात्मिक भाव बनाए रखे।






