मुरैना। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में वर्षायोग हेतु विराजमान जैनाचार्य अभिनंदन सागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवर्ती शिष्य आचार्य श्री 108 उदारसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य को जीवन में उसी आदर्श का अनुसरण करना चाहिए, जो वह स्वयं बनना चाहता है। यदि लक्ष्य परमात्मा पद की प्राप्ति है तो केवल जिनप्रतिमा के दर्शन करना पर्याप्त नहीं, बल्कि परमात्मा के गुणों को समझकर उन्हें अपने आचरण में उतारना आवश्यक है।
परमात्मा के गुणों को पहचानना जरूरी
आचार्यश्री ने कहा कि परमात्मा के वीतराग स्वरूप, तप, त्याग, करुणा और समता को समझकर जीवन में उतारना ही सच्ची आराधना है। परमात्मा बनने की दिशा में पहला कदम उनके वास्तविक स्वरूप की सही पहचान करना है।
उन्होंने कहा कि आज अधिकांश लोग पूजा करते हैं, लेकिन पूजा के वास्तविक उद्देश्य को नहीं समझते। भगवान से कुछ मांगना भक्ति नहीं है, बल्कि भगवान के समान बनने का संकल्प ही सच्ची भक्ति है।
जिनेन्द्र भगवान किसी को सुख-दुःख प्रदान नहीं करते, बल्कि यह प्रेरणा देते हैं कि आत्मा अपने पुरुषार्थ से अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत शक्ति को प्राप्त कर सकती है।
हाथी के प्रसंग से समझाया पहचान का महत्व
आचार्यश्री ने अपने विचारों को एक सरल उदाहरण के माध्यम से समझाया। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति अपना हाथी बेच रहा था। कई ग्राहक हाथी को देखने आए। उनमें एक व्यक्ति बार-बार हाथी को ध्यान से देखता और फिर लौट जाता।
हाथी बेचने वाले को लगा कि शायद वह व्यक्ति हाथी में कोई दोष खोज रहा है। कई बार ऐसा होने के बाद उसने क्रोधित होकर पूछा कि वह बार-बार क्या देख रहा है। ग्राहक ने शांत स्वर में कहा कि वह केवल यह देख रहा है कि हाथी का मुख किस दिशा में है।
आचार्यश्री ने इस प्रसंग के माध्यम से कहा कि जब सामान्य वस्तु या जीव को खरीदने से पहले उसकी सही पहचान करना जरूरी समझा जाता है, तब परमात्मा बनने की आकांक्षा रखने वाले व्यक्ति के लिए परमात्मा के वास्तविक स्वरूप, गुणों और आदर्शों को पहचानना उससे भी अधिक आवश्यक है। सही पहचान के बिना न सही मार्ग मिल सकता है और न ही लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है।
मंदिर आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र
मुनि श्री 108 उपशान्त सागरजी महाराज ने प्रेरणादायी प्रवचन में कहा कि प्राचीन काल में जिनालयों में अनेक दिव्य एवं चमत्कारिक अनुभूतियां होती थीं। वर्तमान समय में ऐसी अनुभूतियां अपेक्षाकृत कम दिखाई देती हैं। इसका कारण मंदिरों की शक्ति में कमी नहीं, बल्कि मनुष्य की श्रद्धा, भक्ति और समर्पण भाव का क्षीण होना है।
उन्होंने कहा कि जहां निष्कपट श्रद्धा, अटूट विश्वास और निर्मल भक्ति होती है, वहां आत्मा स्वयं दिव्यता का अनुभव करती है। मंदिर सदैव आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र रहे हैं, लेकिन मनुष्य की चंचलता, संदेह और भौतिकता के कारण वह दिव्य अनुभूति से दूर होता जा रहा है।
श्रद्धा से जागता है आत्मबोध
मुनि श्री ने कहा कि यदि जीवन में पुनः अटूट श्रद्धा और पूर्ण समर्पण का भाव जागृत किया जाए तो जिनालय केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं रहेंगे, बल्कि आत्मजागरण, आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण के सशक्त केंद्र बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि चमत्कार बाहर नहीं, बल्कि श्रद्धा से परिपूर्ण अंतःकरण में जन्म लेते हैं।
वर्षायोग-2026 की पत्रिका का विमोचन
धर्मसभा के उपरांत मंगल पावन वर्षायोग-2026 की मांगलिक पत्रिका का विधिवत विमोचन किया गया। जैन विद्वत् प्रतिष्ठाचार्य संजय शास्त्री, नवनीत शास्त्री, समिति अध्यक्ष अनिल जैन, बाबूलाल जैन, नेमीचंद जैन, प्रेमचंद जैन, पदमचंद जैन, दर्शनलाल जैन तथा अनिल बरैया एवं विजय जैन के करकमलों से पत्रिका का विमोचन संपन्न हुआ।
9 अगस्त को मंगल कलश स्थापना
वर्षायोग-2026 के तहत 9 अगस्त को मंगल कलश स्थापना का आयोजन किया जाएगा। इसे लेकर धर्मसभा में श्रद्धालुओं में उत्साह रहा और आयोजन की तैयारियों को लेकर भी चर्चा हुई। इस अवसर पर ब्रह्मचारी प्रदीप जैन ‘पीयूष’ (जबलपुर) की विशेष उपस्थिति रही।
श्रद्धालुओं ने लिया आशीर्वाद
धर्मसभा का संचालन विद्वत् नवनीत शास्त्री ने किया। कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने मंचासीन आचार्य श्री 108 उदारसागरजी महाराज के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक अर्घ्य समर्पित कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया



