सागवाड़ा। विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी जी गुरुदेव ने पुनर्वास कॉलोनी, सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में जिनवचन की आध्यात्मिक महत्ता समझाते हुए कहा कि जिनवचन ऐसी औषधि हैं, जो विषय-सुखों का विरेचन करती हैं। ये अमृतस्वरूप हैं और जरा, मरण, रोग तथा समस्त दुखों के क्षय का मार्ग दिखाते हैं।

विषय-सुखों से विरक्ति का मार्ग

आचार्य श्री ने कहा कि जिनवचन ऐसी आध्यात्मिक औषधि हैं, जो इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त होने वाले विषय-सुखों से विरक्ति की प्रेरणा देती हैं। ये साधक के जीवन में आत्मिक संतोष का कारण बनते हैं तथा ज्वर आदि रोगों और उनसे उत्पन्न दुखों के निवारण का आध्यात्मिक मार्ग बताते हैं।

उन्होंने कहा कि रोग आदि कारण हैं और दुख उनके कार्य हैं। जिनवाणी के सिद्धांतों के अनुसार चलने से साधक कर्मों के कारण-कार्य संबंध को समझकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

जिनवचन के प्रति दृढ़ श्रद्धा

आचार्य श्री ने कहा कि जिनवचन में निश्चित बुद्धि रखने वाले साधु विरतिभाव को धारण करते हैं। वे जिनवाणी के सिद्धांतों के अनुरूप जीवन जीने का प्रयास करते हैं और शास्त्र के प्रतिकूल आचरण से बचते हैं जिनवचन के प्रति दृढ़ श्रद्धा साधक को संयम और आत्मानुशासन के मार्ग पर स्थिर रखती है।

आगम के प्रतिकूल आचरण नहीं

उन्होंने कहा कि सम्यक्त्व के विषयभूत पदार्थों में रुचि रखने वाले धैर्यशाली साधु चारित्र का दृढ़ता से पालन करते हैं। वे मरण को भी स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन शास्त्र के प्रतिकूल आचरण नहीं करते।

उन्होंने स्पष्ट किया कि शरीर में उत्पन्न व्याधि को दूर करने के लिए भी जिनागम के सिद्धांतों का उल्लंघन करके अप्रासुक वस्तु का सेवन नहीं करना चाहिए। साधक के लिए आगम की मर्यादा सर्वोपरि है।

संयम और चारित्र की प्रेरणा

आचार्य श्री ने कहा कि जिनवाणी केवल सुनने या पढ़ने का विषय नहीं है, बल्कि उसके सिद्धांतों को जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना है। जिनवचनों में श्रद्धा रखने वाला साधक विषय-सुखों से विरक्त होकर संयम, चारित्र और आत्मकल्याण के मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ता है।