इंदौर। श्रमण संस्कृति के महाश्रमण मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने गुरुवार को देशना मंडप में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कर्म सिद्धांत की महत्ता समझाई। उन्होंने कहा कि संसार में यदि कोई सबसे बलवान है तो वह कर्म है। कर्म न किसी के मीत होते हैं और न किसी पर दया करते हैं। इसलिए मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए।

कर्मों से रहना चाहिए सावधान

मुनिश्री ने कहा कि पूर्व जन्म के कर्मों के कारण ही भगवान आदिनाथ को सात माह सात दिन तक आहार की विधि नहीं मिली थी। उन्होंने कहा कि व्यक्ति गुरु या भगवान से भले न डरे, लेकिन कर्मों से जरूर डरे, क्योंकि कर्म किसी को नहीं छोड़ते।

कर्मों के परिणाम से बचने के लिए मनुष्य को अपने वर्तमान जीवन में अच्छे भाव, संयम और धर्माचरण को अपनाना चाहिए। अपने कर्मों के प्रति जागरूक रहना ही आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

धर्म की परंपरा को आगे बढ़ाएं

मुनिश्री ने भारतीय परिवार व्यवस्था और संस्कारों की चर्चा करते हुए कहा कि परिवार और वंश की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए जिस प्रकार वारिस आवश्यक माना जाता है, उसी प्रकार धर्म की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए भी धर्म संस्कारों से युक्त अगली पीढ़ी आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि अपनी संतान को ऐसे संस्कार देकर जाना चाहिए, जिससे माता-पिता के बाद भी परिवार के सदस्योंमें धर्म और संस्कार जीवित रहें।

देवदर्शन के बाद भोजन का संकल्प

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि यदि सभी लोग यह नियम बना लें कि परिवार के सभी सदस्य देवदर्शन के बाद ही भोजन करेंगे, तो धर्म की परंपरा परिवार में जीवित रह सकती है। बच्चों में भी धर्म के प्रति संस्कार विकसित होंगे और वे वही आचरण आगे बढ़ाएंगे, जो उन्होंने अपने परिवार में देखा है।

धर्मसभा में श्रद्धालुओं की सहभागिता

धर्मसभा का संचालन अनुराग जैन ने किया। इस अवसर पर आकाश कोल, प्रिंसिपल टोंग्या, सपना मनीष गोधा, आनंद नवीन गोधा, भूपेंद्र जैन, अखिलेश सोधिया, श्रीमती मुक्ता जैन, सोनाली बगड़िया सहित अन्य श्रद्धालु उपस्थित रहे।