मुरैना। दस दिवसीय पर्वराज पर्युषण के अंतर्गत श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में शनिवार को चौथे दिन उत्तम शौच धर्म की आराधना हुई। धर्मसभा को संबोधित करते हुए ज्ञानरत्नाकर आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज ने कहा कि शौच धर्म का अर्थ केवल बाहरी स्वच्छता नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और विचारों की पवित्रता है।

उन्होंने कहा कि शरीर को स्वच्छ रखने के लिए जिस प्रकार स्नान आवश्यक है, उसी तरह आत्मा की निर्मलता के लिए लोभ, लालच, संग्रह और परिग्रह जैसी प्रवृत्तियों को कम करना आवश्यक है।

‘सुख अधिक संग्रह में नहीं, इच्छाओं को सीमित करने में’

आचार्य श्री ने कहा कि लोभ मनुष्य के मन को तृप्त नहीं होने देता। धन, संपत्ति और साधन बढ़ने के साथ इच्छाएं भी बढ़ती जाएं तो व्यक्ति संतोष का अनुभव नहीं कर पाता।

उन्होंने कहा, “वास्तविक सुख वस्तुओं के अधिक संग्रह में नहीं, बल्कि इच्छाओं को सीमित करने में है।” उत्तम शौच धर्म व्यक्ति को अनावश्यक आसक्ति से बचते हुए जो प्राप्त है उसमें संतोष का भाव रखने की प्रेरणा देता है।

मन निर्मल तो व्यवहार सरल और वाणी मधुर

आचार्य उदारसागर जी ने कहा कि मन में ईर्ष्या, द्वेष, कपट और लोभ का मैल जमा हो तो केवल बाहरी स्वच्छता पर्याप्त नहीं है।

“जिसका मन निर्मल है, उसके व्यवहार में सरलता, वाणी में मधुरता और जीवन में संतोष दिखाई देता है।”

उन्होंने कहा कि पर्युषण आत्मचिंतन का अवसर है। इन दिनों व्यक्ति को अपने भीतर देखकर यह पहचानने का प्रयास करना चाहिए कि कौन से विकार जीवन में जड़ जमा चुके हैं और उन्हें किस तरह कम किया जा सकता है।

‘धन साधन बने, जीवन का उद्देश्य नहीं’

आचार्य श्री ने कहा कि उत्तम शौच धर्म संतोष, संयम और निष्परिग्रह की ओर ले जाता है। धन-संपत्ति का उपयोग जीवन को सार्थक बनाने के लिए होना चाहिए, उसे ही जीवन का उद्देश्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने श्रद्धालुओं से क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों को कम करने तथा बाहरी आडंबर से अधिक अंतर्मन की शुद्धि पर ध्यान देने का आह्वान किया।

‘संग्रह की जगह संतोष आए तो जीवन में उतरता है शौच धर्म’

धर्मसभा में मुनि श्री उपशांत सागर जी महाराज ने कहा कि जिस दिन व्यक्ति के भीतर संग्रह की जगह संतोष, लोभ की जगह त्याग और अशुद्ध विचारों की जगह आत्मचिंतन आने लगता है, उसी दिन उत्तम शौच धर्म उसके जीवन में उतरने लगता है।

उन्होंने कहा कि पर्युषण का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएं करना नहीं, बल्कि धर्म के गुणों को व्यवहार में उतारना है। त्याग, संतोष, संयम और सरलता को जीवन में अपनाकर आत्मा की निर्मलता की दिशा में बढ़ा जा सकता है।

पुष्पदंत भगवान का मोक्ष कल्याणक मनाया

आचार्य श्री उदारसागर जी एवं मुनि श्री उपशांत सागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में जैन धर्म के नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंतनाथ का मोक्ष कल्याणक हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

प्रतिष्ठाचार्य पं. महेंद्रकुमार शास्त्री ने विधि-विधान एवं मंत्रोच्चार के साथ निर्वाण कांड का वाचन कराया। प्रथम निर्वाण लाडू समर्पित करने का पुण्यार्जन डालचंद जैन वरहाना परिवार को प्राप्त हुआ। इसके बाद उपस्थित श्रद्धालुओं ने भी निर्वाण लाडू समर्पित किए।

अभिषेक-शांतिधारा के साथ हुई दशलक्षण पूजा

प्रातः जिनेंद्र प्रभु के प्रथम अभिषेक का पुण्यार्जन पूर्व प्राचार्य अनिल जैन को मिला। प्रथम शांतिधारा विमलकुमार-आशीष जैन रेडियो परिवार तथा द्वितीय शांतिधारा मयंक-मान जैन कलकत्ता परिवार ने की।

आचार्य श्री उदारसागर जी के मुखारविंद से शांतिधारा का वाचन हुआ। सामूहिक नित्यमह पूजन के बाद संगीतमय दशलक्षण पूजन में उत्तम शौच धर्म की आराधना की गई।