मुरैना। दशलक्षण महापर्व के छठवें दिन श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में ज्ञान रत्नाकर आचार्य श्री उदारसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य का जीवन अनमोल है, लेकिन उसकी सार्थकता तभी है जब हम अपनी इच्छाओं, इंद्रियों और विकारों पर नियंत्रण रखना सीखें।

उन्होंने कहा कि संयम का अर्थ स्वयं को रोकना नहीं, बल्कि स्वयं को सही दिशा में आगे बढ़ाना है।

जीवन की गाड़ी में संयम रूपी ब्रेक जरूरी

आचार्यश्री ने जीवन को वाहन से जोड़ते हुए कहा कि बिना ब्रेक की गाड़ी अपनी गति को नियंत्रित नहीं कर सकती और सुरक्षित रूप से मंजिल तक नहीं पहुंच सकती। ठीक इसी प्रकार जीवन की गाड़ी में संयम रूपी ब्रेक होना चाहिए।

जिस व्यक्ति के जीवन में संयम नहीं होता, वह इच्छाओं और वासनाओं की तेज गति में बहता चला जाता है। उसे यह बोध नहीं रहता कि कहां रुकना है और किस दिशा में आगे बढ़ना है। संयम मनुष्य को रुकना, विचार करना और सही निर्णय लेना सिखाता है।

नियम और अनुशासन से सुरक्षित रहता है जीवन

उन्होंने कहा कि संसार में प्रत्येक कार्य के लिए नियम और अनुशासन आवश्यक हैं। जैसे सड़क पर वाहन चलाते समय लाल बत्ती पर रुकना, गति सीमा का ध्यान रखना और सुरक्षित दूरी बनाए रखना जरूरी है, वैसे ही जीवन में आत्मानुशासन जरूरी है।

धन, विद्या और प्रतिष्ठा तभी सार्थक हैं जब जीवन में संयम हो। बिना अनुशासन का जीवन दुर्घटनाग्रस्त हो सकता है। असंयमित जीवन पतन की ओर ले जाता है, जबकि संयमित जीवन आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाता है।

विकारों पर नियंत्रण की कला है संयम

आचार्यश्री ने कहा कि क्रोध में कहे गए गलत शब्द वर्षों के संबंधों को पलभर में खराब कर सकते हैं। लोभ व्यक्ति से गलत कार्य करा सकता है, मोह विवेक छीन लेता है और अहंकार अपने ही लोगों से दूर कर देता है। संयम इन सभी विकारों पर नियंत्रण रखने की कला है।

गृहस्थ जीवन में भी आवश्यक है संयम

मुनि श्री उपशांतसागर महाराज ने कहा कि उत्तम संयम केवल साधु-संतों के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक गृहस्थ के लिए भी आवश्यक है। गृहस्थ भोजन में संयम रख सकता है, वाणी पर नियंत्रण कर सकता है, क्रोध को शांत कर सकता है, अनावश्यक खर्च से बच सकता है और इंद्रियों को अनुशासित कर सकता है।

उन्होंने कहा कि परिवार और समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए अधिकार से अधिक कर्तव्य तथा स्वतंत्रता से अधिक आत्मानुशासन का महत्व समझना होगा।

धूप दशमी पर सुगंधित धूप अर्पित

दिगंबर जैन परंपरा में दशलक्षण महापर्व के छठवें दिन धूप दशमी का विशेष धार्मिक महत्व है। इस अवसर पर सभी जिनालयों में श्रद्धालुओं ने शुद्ध सामग्री से बनी सुगंधित धूप अग्नि में समर्पित कर भगवान जिनेन्द्र देव की आराधना की तथा कर्मों के क्षय और आत्मशुद्धि की मंगल भावना की।

धूप अर्पित करने का उद्देश्य केवल वातावरण को सुगंधित करना नहीं, बल्कि आत्मा में व्याप्त राग-द्वेष और कषायों को दूर करने का भाव जगाना है। जिस प्रकार धूप की सुगंध चारों ओर फैलती है, उसी प्रकार जीवन में सदाचार, संयम, अहिंसा और धर्माचरण की सुगंध समाज में फैलनी चाहिए।

श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना