भगवान आदिनाथ ने जीवन में पुरुषार्थ करने और विभिन्न विद्याओं व कलाओं के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने का उपदेश दिया। भगवान आदिनाथ की जयंती पर पढ़िए अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज का यह विशेष आलेख...
जैन धर्म की परम्परा में वर्तमान काल में भगवान आदिनाथ प्रथम तीर्थंकर हैं। भगवान आदिनाथ ने जीवन में पुरुषार्थ करने और विभिन्न विद्याओं व कलाओं के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने का उपदेश दिया। अब तक अनंत तीर्थंकर हो चुके हैं। एक काल में 24 तीर्थंकर ही होते हैं। इस काल के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान हैं। काल दो प्रकार के होते हैं। एक उत्सर्पिणी और दूसरा अवसर्पिणी। जो काल उत्थान से पतन की और जाता है वह अवसर्पिणी काल है। जो पतन से उत्थान की और जाए वह उत्सर्पिणी काल है, तो मौजूदा काल अवसर्पिणी काल है और इस काल के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ हुए हैं।
भोगभूमि से कर्मभूमि तकभगवान आदिनाथ के जन्म से पहले तक भोगभूमि की व्यवस्था थी। जब उन्होंने जगत को पुरुषार्थ का ज्ञान दिया तब से कर्मभूमि की व्यवस्था शुरू हुई। भोगभूमि में पुरुषार्थ की आवश्यकता नहीं होती। उनमें सब कुछ कल्पवृक्ष से मिलता है। लेकिन कर्मभूमि में मनुष्य को पुरुषार्थ कर जीविकोपार्जन के साधन स्वयं जुटाने पड़ते हैं। यह कैसे करना है, जीवन जीने के तरीके क्या होने चाहिए और समाज में रहने हुनर क्या है, यह सब भगवान आदिनाथ ने बताया। उन्होंने परिवार को बढ़ाने के लिए विवाह पद्धति का वर्णन किया।
दी थी वर्ण व्यवस्थाभगवान आदिनाथ ने सामाजिक व्यवस्था के संचालन के लिए नगर, गांव, मकान आदि बनाने और उन्हें बसाने का उपदेश दिया था। इसी के साथ उन्होंने वर्ण व्यवस्था का उपदेश भी दिया। उन्होंने वर्ण व्यवस्था की स्थापना प्रजा के कार्य के अनुसार की थी। जो लोग विपत्ति के समय मनुष्यों की रक्षा करने के नियुक्त किए गए थे, वे क्षत्रिय कहलाए। वाणिज्य, खेती, गोरक्षा आदि के व्यापार में जो लगे थे वे वैश्य कहलाए। जो निम्नस्तर का कार्य करते थे तथा धार्मिक शास्त्रों से दूर भागते थे, वे शूद्र कहलाए। इसके बाद भरत चक्रवर्ती ने पूजा, पाठ करने वाले और यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने वाले ब्राह्मण वर्ण की स्थापना की। इस प्रकार से जैन धर्म में चार वर्ण की स्थापना उल्लेख मिलता है। संस्कारों के बीजरूप का शंखनाद करते हुए आदिनाथ भगवान ने अपने पुत्र को अपने हाथों से जनेऊ संस्कार किया। जनेऊ संस्कार का मतलब होता था कि अब यह मद्य, मांस, मधु, बड़, पीपल, कटुम्बर, अंजीर, गूलर आदि का सेव नहीं करेगा। जनेऊ पहनने वाला ही जिनेन्द्र की पूजा, अभिषेक कर सकता है क्यों कि वह अष्टमूलगुणों का पालन करने वाला है।
बताया आजीविका का साधनभगवान आदिनाथ ने असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प, विद्या जैसे छह कर्मों को आजीविका का साधन बताया। इस व्यवस्था का उद्देश्य था कि इससे दूसरों के जीवन के लिए उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन हो। मनुष्य एक-दूसरे के जीवनयापन में सहयोगी बन कर सामाजिक व्यवस्थाओं में सहयोगी बनें। अजीविका का अर्जन करते समय भी धर्म के प्रति श्रद्धा बनी रहे, इसके लिए छह आवश्यक कर्म देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, त्याग(दान) बताए, ताकि इनके माध्यम से मनुष्य धर्म ध्यान कर पुण्य का संचय कर सकें और जीवन में जो अशुभ कर्म का बन्ध किया है, उनका नाश कर सके।
समाज में स्त्रीशिक्षा के महत्व को स्थापित करने के लिए भगवान आदिनाथ ने अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि लिखने का एवं सुन्दरी को इकाई, दहाई आदि अंक विद्या सिखाई। इसी प्रकार भगवान ने अपने भरत, बाहुबली आदि सभी पुत्रों को सभी विद्याओं का अध्ययन कराया था। इसी तरह जीवन में कलाओं के महत्व को स्थापित करने के लिए भगवान आदिनाथ ने 72 कलाओं का उपदेश भी दिया है। तो इस तरह हम देखते हैं कि मनुष्य को भोगभूमि से कर्मभूमि में लाकर भगवान आदिनाथ ने पुरुषार्थ का उपदेश दिया और उस व्यवस्था का निर्माण किया जो आज तक चली आ रही है तथा जीविकोपार्जन के मूल सिद्धांतों में शामिल है।




