मुरैना। नगर में चातुर्मासरत जैनाचार्य विद्यासागरजी एवं आचार्यश्री अभिनंदन सागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवर्ती शिष्य आचार्य श्री उदारसागर महाराज ने बड़ा जैन मंदिर में हुई धर्मसभा में आचार्य समंतभद्र स्वामी रचित रत्नकरण्ड श्रावकाचार के माध्यम से सच्चे गुरु के लक्षणों पर विस्तार से प्रकाश डाला। आचार्यश्री ने कहा कि गुरु केवल उपदेश देने वाला नहीं, बल्कि अपने आचरण से शिष्य को धर्म, संयम और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाने वाला होता है। आचार्यश्री ने कहा कि सच्चे गुरु की पहचान उनके ज्ञान के साथ-साथ उनके त्याग, तप, संयम और अपरिग्रह से होती है। मूलाचार में वर्णित गुरु के चार भेदों की चर्चा करते हुए उन्होंने नग्नत्व की महत्ता समझाई।

आचार्यश्री ने सूई, पापड़ और बड़ी का दिया उदाहरण

आचार्यश्री ने कहा कि दिगम्बर साधु का नग्नत्व किसी प्रदर्शन का विषय नहीं, बल्कि पूर्ण अपरिग्रह और संसार के प्रति ममत्व के त्याग का प्रतीक है। साधु जब वस्त्र सहित समस्त बाहरी परिग्रहों का त्याग करता है, तब वह आत्मा की वास्तविक स्वतंत्रता की ओर बढ़ता है। मनुष्य के पास वस्तुएं कम हों, यह मात्र अपरिग्रह नहीं है, वस्तुओं के प्रति ममत्व समाप्त होना वास्तविक अपरिग्रह है। आचार्यश्री ने सूई, पापड़ और बड़ी के उदाहरण देते हुए कहा कि वस्तु छोटी हो या बड़ी, मूल्यवान हो या सामान्य यदि उसके प्रति मन में ‘यह मेरा है’ का भाव उत्पन्न हो गया तो वही परिग्रह बन जाता है। इसलिए परिग्रह वस्तु में नहीं, मन की आसक्ति में रहता है।

संग्रह के बीच का अंतर समझकर अपरिग्रह अपनाएं

आचार्यश्री कहते हैं कि आज मनुष्य सुविधाओं को सुख समझने लगा है। घर बड़ा होता जा रहा है, वस्तुओं की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन मन की शांति कम होती जा रही है। इसका कारण बाहरी साधनों की कमी नहीं, बल्कि भीतर बढ़ता हुआ ममत्व और मोह है। जैन दर्शन हमें वस्तुओं का विरोध करना नहीं, बल्कि उनके प्रति आसक्ति का त्याग करना सिखाता है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति आवश्यकता और संग्रह के बीच का अंतर समझकर अपरिग्रह की भावना को अपना सकता है।

बाहरी शत्रु को जीतना आसान, अंदर के शत्रु को जीतना कठिन

धर्मसभा में मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि बाहरी शत्रु को पराजित करना आसान हो सकता है, लेकिन अपने भीतर बैठे क्रोध, मान, माया, लोभ, राग और द्वेष को जीतना अत्यंत कठिन है। इसलिए भगवान की आराधना का वास्तविक उद्देश्य अपने भीतर के विकारों को पहचानना और उन्हें दूर करना होना चाहिए। भगवान नेमिनाथ के जीवन से हमें यही प्रेरणा मिलती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी आकर्षक क्यों न हों, आत्मकल्याण का मार्ग सर्वाेपरि है।

हम अपने भीतर सद्भाव का जन्म करें

मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को प्रतिदिन स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि आज मैंने अपने भीतर के कौन से विकार को कम किया, किसके प्रति द्वेष घटाया, किसके प्रति क्षमा का भाव रखा और अपने जीवन में कितना संयम बढ़ाया। यही आत्मचिंतन धीरे-धीरे व्यक्ति को आत्मविजय की ओर ले जाता है। मुनिश्री ने कहा कि कल्याणक महोत्सव की सार्थकता तभी है, जब भगवान के जीवन का कोई एक गुण हमारे जीवन का हिस्सा बने। भगवान के जन्म कल्याणक पर हम अपने भीतर सद्भाव का जन्म करें और तप कल्याणक पर अपनी बुरी आदतों तथा कषायों के त्याग का संकल्प लें। यही भगवान की सच्ची आराधना और कल्याणक महोत्सव का वास्तविक संदेश है।

भगवान पार्श्वनाथ स्वामी के मोक्ष कल्याणक पर होगा महोत्सव

विद्वत नवनीत जैन शास्त्री ने बताया कि बुधवार 19 अगस्त को जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव बड़े जैन मंदिर में आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ससंघ के सान्निध्य एवं मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज के निर्देशन में निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा। महोत्सव के लिए बड़े जैन मंदिर के प्रांगड़ में श्री सम्मेद शिखरजी पर्वत की कृत्रिम रचना कर पहाड़ का निर्माण किया गया है। इस अवसर प्रातः 7 बजे श्री पार्श्वनाथ स्वामी का जलाभिषेक, वृहद शांतिधारा एवं विशेष पूजन किया जाएगा। प्रातः 8.15 पर आचार्यश्री एवं मुनिश्री के प्रवचन होंगे और 9.30 बजे मोक्ष लक्ष्मी की कामना के साथ निर्वाण कांड का वाचन करते हुए निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा।