कुण्डलपुर (म.प्र.)। दशलक्षण महापर्व के संस्कार शिविर के समापन अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समतासागर जी महाराज ने कहा कि धर्म केवल पूजा-अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन में मर्यादा, संयम और आत्मनियंत्रण उतारने का नाम है। उन्होंने कहा, “मर्यादा जहां है, वहीं ब्रह्म है।”

तीर्थयात्रा में कष्ट को साधना मानें

मुनिश्री ने कहा कि तीर्थयात्रा में होने वाली असुविधाओं को शिकायत का विषय बनाने के बजाय साधना का हिस्सा मानकर सहन करना चाहिए। तीर्थयात्रा का उद्देश्य सुविधा नहीं, धर्मलाभ और आत्मशुद्धि है।

उन्होंने एक वृद्ध महिला का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि तीर्थ यात्रा में आने वाले कष्टों का धैर्यपूर्वक सामना करना चाहिए। वास्तविक समस्या हो तो संबंधित व्यक्ति को शांत भाव से बताया जा सकता है, लेकिन शिकायत को तीर्थयात्रा का विषय नहीं बनाना चाहिए।

मुनिश्री ने शिविरार्थियों से कहा कि वे “शिविरार्थी बनकर आए हैं, शरणार्थी बनकर नहीं।” क्षेत्र कमेटी और कार्यकर्ताओं का दायित्व बेहतर व्यवस्था देना है, वहीं शिविरार्थियों को भी संतोष और समायोजन की शक्ति विकसित करनी चाहिए।

गृहस्थ जीवन में संस्कारों की जिम्मेदारी

मुनिश्री ने कहा कि ब्रह्मचारी आश्रम से गृहस्थ जीवन में प्रवेश के बाद व्यक्ति की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उसे अपने साथ परिवार को भी धर्म-संस्कारों में संभालना होता है। खान-पान, पहनावा, बोलचाल और रहन-सहन में बढ़ती स्वच्छंदता व्यक्ति को अमर्यादा की ओर ले जा सकती है।

उन्होंने कहा कि दशलक्षण धर्म के सिद्धांतों को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है, उन्हें दैनिक व्यवहार में उतारना आवश्यक है। भगवान के दर्शन, पूजा-पाठ, दान, नियम और आत्मसंयम को जीवन का नियमित हिस्सा बनाना चाहिए।

आहार की शुद्धता पर विशेष जोर

मुनिश्री ने आहार की शुद्धता को विचारों की शुद्धता से जोड़ते हुए मांसाहार से बचने की प्रेरणा दी। उन्होंने भोजन के प्रत्येक चयन में धार्मिक मर्यादा का ध्यान रखने तथा सामाजिक समारोहों में भी सिद्धांतों से समझौता न करने का संदेश दिया।

उन्होंने कहा कि यदि किसी स्थान पर अपने धार्मिक मानदंडों के अनुरूप भोजन उपलब्ध न हो, तो विनम्रतापूर्वक उससे अलग रहना चाहिए।

नियम-संयम की पूंजी साथ ले जाएं

मुनिश्री ने कहा कि संस्कार शिविर की वास्तविक उपलब्धि यहां से मिलने वाली नियम-संयम की पूंजी है। शिविरार्थियों ने वर्षभर, दो वर्ष और आजीवन के संकल्प लिए हैं। इन संस्कारों को वर्षभर जीवन में उतारना ही शिविर की सार्थकता है।

उन्होंने अगले वर्ष अनंत चतुर्दशी के दिन यात्रा न कर शिविर में रहकर उपवास एवं साधना करने तथा अगले दिन स्वल्पाहार, अभिषेक-पूजन और क्षमावाणी के बाद प्रस्थान करने की प्रेरणा दी।

शोभायात्रा और निर्वाण लाडू

दमोह गौरव क्षुल्लक श्री स्वस्तिकसागर जी महाराज एवं ऐलक श्री निश्चयसागर जी महाराज ने भी संबोधित किया। भगवान वासुपूज्य जी के मोक्ष कल्याणक महोत्सव पर निर्वाण लाडू अर्पित किया गया।

दोपहर में गाजे-बाजे के साथ श्रीजी की शोभायात्रा निकाली गई, जो कुण्डलपुर नगर भ्रमण करते हुए शिविर पंडाल पहुंची। वहां धार्मिक आयोजन, तत्त्वार्थसूत्र वाचन तथा छोटे बच्चों के लिए जैनत्व संस्कार विधि कार्यक्रम संपन्न हुआ। कार्यकर्ताओं एवं श्रावक श्रेष्ठियों का सम्मान भी किया गया।

प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि लगभग 1600 श्रद्धालुओं ने धार्मिक अनुष्ठानों के साथ नियम-संयम और जीवन को संस्कारित करने की प्रेरणा ग्रहण की। पूर्व विधायक सुनील जैन एवं श्रीमती निधि जैन ने भी मुनिसंघ का आशीर्वाद प्राप्त किया।

एक नजर में

मुनिश्री ने मर्यादा और संयम को धर्म का वास्तविक स्वरूप बताया।

तीर्थयात्रा की असुविधाओं को साधना का हिस्सा मानने का संदेश दिया।

खान-पान एवं सामाजिक जीवन में धार्मिक मर्यादा बनाए रखने की प्रेरणा दी।

वासुपूज्य भगवान के मोक्ष कल्याणक पर निर्वाण लाडू अर्पित किया गया।

लगभग 1600 शिविरार्थियों ने नियम-संयम के संकल्प ग्रहण किए।

श्रीफल साथी : राजीव सिंघई, कुण्डलपुर