मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री 108 उदारसागर जी महाराज ने कहा कि जैन दर्शन आत्मचिंतन, वैराग्य और आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। धर्म का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएं करना, शास्त्र पढ़ना अथवा दूसरों को उपदेश देना नहीं, बल्कि प्राप्त ज्ञान को जीवन और आचरण में उतारना है।
उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति अपने भीतर झांककर स्वयं को बदलने का प्रयास नहीं करता, तब तक उसका ज्ञान पुस्तकों और शब्दों तक सीमित रहता है।
दूसरों की कमी नहीं, अपने दोष देखें
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य संसार को समझाने में जितनी रुचि लेता है, उतना प्रयास यदि स्वयं को समझने और सुधारने में करे तो जीवन में वास्तविक परिवर्तन आ सकता है। स्वाध्याय और धर्म के सिद्धांतों का उपयोग दूसरों की गलतियां खोजने के बजाय अपने दोषों को पहचानने और दूर करने में होना चाहिए।
प्रसंग से समझाया मोह का प्रभाव
आचार्यश्री ने एक प्रसंग के माध्यम से समझाया कि दूसरों को संसार की नश्वरता और मृत्यु की अनिवार्यता का उपदेश देना सहज है, किंतु वही परिस्थिति स्वयं पर आने पर व्यक्ति ज्ञान को भूलकर मोह में पड़ जाता है।
उन्होंने कहा कि दुख दूसरों के जीवन में आने पर हम धैर्य की बात करते हैं, लेकिन जब हमारे अपने जीवन में प्रतिकूलता आती है तो विवेक कमजोर पड़ जाता है। इसलिए ज्ञान को व्यवहार में उतारने का सतत प्रयास करना चाहिए।
मोह दुख का कारण बनता है
मुनि श्री 108 उपशांतसागर जी महाराज ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार संसार परिवर्तनशील है। प्रत्येक जीव कर्मों के अनुसार जन्म-मरण के चक्र में परिभ्रमण करता है। शरीर नश्वर है और संयोग-वियोग जीवन का स्वाभाविक क्रम है। उन्होंने कहा कि प्रियजन के वियोग में संवेदना रखना स्वाभाविक है, लेकिन शोक में डूबकर जीवन की वास्तविकता को भूल जाना उचित नहीं है। मोह ही दुख का कारण बनता है।
मृत्यु का चिंतन जीवन को सार्थक बनाता है
मुनि श्री ने कहा कि राजा हो या रंक, धनवान हो या शक्तिशाली, मृत्यु से कोई नहीं बच सकता। पद, प्रतिष्ठा, संपत्ति और शरीर का वैभव यहीं रह जाता है। मृत्यु का चिंतन निराशा के लिए नहीं, बल्कि जीवन को सदाचार, परोपकार और आत्मकल्याण की दिशा में सार्थक बनाने के लिए होना चाहिए।
श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना





