कुण्डलपुर (म.प्र.)। जैन पाठशालाओं के बेहतर संचालन, शिक्षण व्यवस्था में सुधार तथा विद्यार्थियों में धार्मिक संस्कारों के विकास के उद्देश्य से जैन पाठशाला अधिवेशन 2026 का आयोजन 3 एवं 4 अक्टूबर को किया जाएगा। दो दिवसीय अधिवेशन निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज के संघ सानिध्य में आयोजित होगा।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि अधिवेशन में पाठशाला के विद्यार्थी, शिक्षक, संयोजक और विद्वान शामिल होकर मुनि संघ का मार्गदर्शन प्राप्त करेंगे।
पहले दिन विद्यार्थी प्रस्तुतियां और जिज्ञासा समाधान
3 अक्टूबर को प्रातः 6:45 बजे मंगलाचरण एवं दीप प्रज्वलन के साथ अधिवेशन का शुभारंभ होगा। इसके पश्चात सामूहिक पूजन तथा विभिन्न पाठशालाओं के विद्यार्थियों की प्रस्तुतियां होंगी। प्रत्येक पाठशाला को प्रस्तुति के लिए पांच मिनट का समय निर्धारित किया गया है।
दोपहर के सत्र में पाठशालाओं के समक्ष आने वाली कठिनाइयों और उनके समाधान पर ब्रह्मचारी भैया जी मार्गदर्शन देंगे। मुनि संघ एवं आगंतुक विद्वान शिक्षण और प्रबंधन के प्रभावी तरीकों पर विचार रखेंगे।
सायंकाल आचार्य भक्ति के बाद मुनि श्री द्वारा पाठशालाओं की समस्याओं पर जिज्ञासा समाधान किया जाएगा। ब्रह्मचारी भैया जी के उद्बोधन के पश्चात विद्यार्थियों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होंगी।
शिक्षकों और संयोजकों का होगा सम्मान
4 अक्टूबर को मंगलाचरण, दीप प्रज्वलन और सामूहिक पूजन के बाद विद्यार्थियों की प्रस्तुतियां आयोजित होंगी। दोपहर में निर्यापक मुनि श्री एवं विद्वानों का मार्गदर्शन प्राप्त होगा।
अधिवेशन में पाठशाला के शिक्षकों एवं संयोजकों का सम्मान समारोह भी आयोजित किया जाएगा। मुनि संघ के विशेष उद्बोधन के साथ दो दिवसीय अधिवेशन का समापन होगा। शाम के सत्र में आचार्य भक्ति, समता जिज्ञासा समाधान एवं ब्रह्मचारी भैया जी का पाठशाला संदर्भित उद्बोधन होगा।
राग-द्वेष पर विजय से बनता है भगवान
अधिवेशन के संदर्भ में मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि भगवान और इंसान में मूल रूप से कोई अंतर नहीं है। भगवान भी कभी मनुष्य थे, किंतु उन्होंने राग-द्वेष, मोह एवं कषायों पर विजय प्राप्त कर वीतरागता हासिल की और परमात्म पद प्राप्त किया।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक मनुष्य में भगवान बनने की क्षमता विद्यमान है। अनुकूल परिस्थितियों में राग और प्रतिकूलताओं में द्वेष उत्पन्न होता है। इन भावों पर नियंत्रण रखते हुए समता का अभ्यास करना आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
मुनि श्री ने कहा कि भगवान की आराधना केवल पूजा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उनके गुणों को अपने आचरण में उतारना ही सच्ची आराधना है। क्रोध, मान, माया, लोभ और द्वेष को कम करते हुए संयम, स्वाध्याय, तप एवं आत्मचिंतन को जीवन में अपनाना चाहिए।
संस्कार निर्माण की दिशा में सार्थक पहल
अधिवेशन के माध्यम से बच्चों में धर्म के साथ समता, संयम, अनुशासन और अच्छे संस्कार विकसित करने के प्रयासों को प्रभावी बनाने पर विचार होगा। शिक्षण पद्धति एवं पाठशाला संचालन से जुड़े विषयों पर मंथन कर पाठशालाओं को अधिक उपयोगी और सशक्त बनाने का प्रयास किया जाएगा।
सोशल मीडिया पोस्टर सार
कुण्डलपुर में 3-4 अक्टूबर को जैन पाठशाला अधिवेशन 2026।
शिक्षण, संस्कार और पाठशालाओं के बेहतर संचालन पर मुनि संघ के सानिध्य में होगा मंथन।
श्रीफल साथी : राजीव सिंघई





