अंबाह। जैन बगीची में गुरुवार को परम पूज्य आर्यिका श्री 105 सम्पर्कमति माताजी के समाधिमरण उपरांत अंतिम धार्मिक क्रियाएं जैन परंपरा एवं विधि-विधान के अनुसार संपन्न हुईं। णमोकार महामंत्र की पवित्र ध्वनि, श्रद्धा से जुड़े हाथ और नम आंखों के बीच गुरु परम पूज्य गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री संगममति माताजी का सानिध्य पूरे प्रसंग को अत्यंत भावपूर्ण बना रहा।

गुरु के सानिध्य में शिष्या की अंतिम धार्मिक क्रियाएं संपन्न होना उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए विशेष भावुक क्षण था। संगममति माताजी ने अपनी शिष्या के संयम, त्याग, तपस्या और साधनामय जीवन का स्मरण किया। हजारों जैन बंधुओं ने माताजी को श्रद्धासुमन अर्पित किए।

अंतिम तीन दिनों में अन्न-जल का त्याग

जानकारी के अनुसार सम्पर्कमति माताजी ने जीवन के अंतिम तीन दिनों में अन्न-जल का त्याग कर साधना एवं आत्मचिंतन में समय बिताया। बुधवार सायं लगभग 6 बजे णमोकार महामंत्र की महाध्वनि के बीच उन्होंने शांत भाव से शरीर का त्याग किया।

संगममति माताजी ने बताया कि जैन दर्शन में समाधिमरण जीवन की अंतिम अवस्था में समता, संयम और आत्मचिंतन में स्थित रहने की साधना है। इसी भावना के साथ सम्पर्कमति माताजी ने अंतिम समय तक साधनामय जीवन का निर्वाह किया।

डोल यात्रा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

गुरुवार सुबह जैन बगीची से डोल यात्रा प्रारंभ हुई, जो णमोकार महामंत्र के उच्चारण के बीच नगर के प्रमुख मार्गों और बाजार से निकली। सैकड़ों महिला, पुरुष एवं बच्चे डोल यात्रा में शामिल हुए। बाजार के अधिकांश जैन प्रतिष्ठान बंद रहे और मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्प अर्पित कर माताजी को भावांजलि दी।

अंबाह के साथ गुजरात, राजस्थान एवं अन्य दूरस्थ क्षेत्रों से पहुंचे श्रद्धालु भी अंतिम दर्शन और धार्मिक क्रियाओं में सहभागी बने। पूरा नगर णमोकार महामंत्र की ध्वनि एवं गुरु भक्ति के भाव से गुंजायमान रहा।

जैन बगीची में संपन्न हुईं धार्मिक क्रियाएं

डोल यात्रा के पश्चात जैन बगीची में विद्वानों के निर्देशन में जैन धर्म की परंपरा और मर्यादा के अनुरूप अंतिम धार्मिक क्रियाएं संपन्न कराई गईं। इस दौरान श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से णमोकार महामंत्र का उच्चारण कर माताजी के प्रति विनयांजलि अर्पित की।

वातावरण अत्यंत शांत और भावपूर्ण रहा। श्रद्धालु माताजी के त्याग, तपस्या और संयम का स्मरण करते हुए नतमस्तक रहे।

दीक्षा से समाधि तक साधना की यात्रा

समाजजनों ने कहा कि सम्पर्कमति माताजी का जीवन गृहस्थ जीवन से वैराग्य, दीक्षा से संयम और संयम से समाधि तक की साधनामय यात्रा रहा। उन्होंने वर्ष 2016 में बारां, राजस्थान में जैन दीक्षा ग्रहण की थी। इसके बाद उन्होंने अपना जीवन धर्म, स्वाध्याय, तपस्या और आत्मकल्याण को समर्पित कर दिया।

समाजजनों के अनुसार अंबाह नगर में किसी जैन साध्वी के समाधिमरण उपरांत ऐसा धार्मिक प्रसंग पहली बार हुआ। गुरु संगममति माताजी के सानिध्य, हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति और णमोकार महामंत्र की गूंज ने इस अवसर को धर्म एवं आत्मचिंतन की प्रेरणा का माध्यम बना दिया।

श्रीफल साथी : अजय जैन, अंबाह