जयपुर। जनकपुरी-ज्योतिनगर स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन आचार्य श्री 108 आदित्य सागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में मार्दव धर्म की आराधना श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ संपन्न हुई।

“मान महाविषरूप, करहि नीच-गति जगत में।

कोमल सुधा अनूप, सुख पावे प्राणी सदा॥”

इसी भाव को समझाते हुए आचार्यश्री ने धर्मसभा में कहा कि मान अर्थात अहंकार आध्यात्मिक विकास में बाधक है। मनुष्य को अभिमान का परिधान त्यागकर विनम्रता और धर्म आराधना के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।

बीजाक्षर युक्त शांतिधारा से विश्वशांति की मंगलकामना

वर्षायोग समिति के मुख्य संयोजक पदम जैन बिलाला ने बताया कि प्रातःकाल मंडल पर विश्वशांति की मंगलकामना के साथ बीजाक्षर युक्त शांतिधारा की गई। शांतिधारा करने का सौभाग्य जिनेंद्र जैन एवं मंजू पाटनी परिवार को प्राप्त हुआ। मंदिर में नित्य पूजन-विधान के साथ सोलह कारण एवं पंचमेरु पूजन भी श्रद्धापूर्वक की गई।

विदुषी आशिका और अनुषि जैन करा रहीं पूजन-विधान

श्रमण संस्कृति संस्थान से आईं विदुषी आशिका जैन एवं अनुषि जैन द्वारा पूजन-विधान भक्तिभाव एवं विधि-विधान से कराया जा रहा है। दशलक्षण विधान गणिनी आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी द्वारा रचित विधान के अनुसार संपन्न किया जा रहा है।

‘मान एक प्रकार का महाविष’

धर्मसभा में आचार्य श्री आदित्य सागर जी महाराज ने मार्दव धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि मान अर्थात अहंकार एक प्रकार का विष है, जो व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में बाधक बनता है।

आचार्यश्री ने रावण आदि के अभिमान से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से मान के विभिन्न स्वरूपों को समझाया। उन्होंने सम्मान, स्वाभिमान और अभिमान के बीच अंतर भी उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया।

मार्दव आत्मा को सरल और सहज बनाता है’

आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य को अभिमान के परिधान को त्यागकर विनम्रता एवं धर्म की आराधना के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। मार्दव धर्म आत्मा को सरल, सहज और विनम्र बनाने का संदेश देता है।

तत्त्वार्थ सूत्र अध्ययन से लेकर गुरु भक्ति तक

मंदिर में दिन के समय तत्त्वार्थ सूत्र का अध्ययन कराया जा रहा है। सायंकाल श्रीजी की आरती, गुरु भक्ति एवं आचार्यश्री के मंगल प्रवचन हो रहे हैं। बुधवार शाम महिला मंडल द्वारा तीर्थंकर नेमिनाथ अर्चना भी की गई।