इंदौर। श्रावक संस्कार शिविर एवं दशलक्षण महापर्व के अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म के अवसर पर मुनि पुंगव 108 श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए मिथुन चक्र, ब्रह्मचर्य, निमित्त और आत्मिक शक्ति का गहन विवेचन किया।

दो तत्त्वों के संयोग को बताया मिथुन चक्र

मुनिश्री ने कहा कि संसार की अनेक क्रियाएं और उपलब्धियां दो तत्त्वों के परस्पर संयोग से प्रकट होती हैं, इसे मिथुन चक्र कहा जा सकता है। भूख के बिना भोजन का महत्व, प्यास के बिना पानी का महत्व और गुरु के बिना शिष्य की पूर्णता समझ में नहीं आती।

उन्होंने कहा कि भगवान और भक्त, गुरु और शिष्य सहित अनेक संबंध परस्पर पूरकता का संदेश देते हैं। रोटी न आत्मा अकेली खाती है, न शरीर अकेला; आत्मा और शरीर के संयोग से भोजन की क्रिया होती है। इसी प्रकार चलना, सोना, देखना, सुनना तथा अन्य अनेक क्रियाएं विभिन्न तत्त्वों के संबंध से संचालित होती हैं।

मुनिश्री ने कहा, “वस्तु स्वतंत्र है, लेकिन वस्तु का कार्य स्वतंत्र नहीं है; उसका कार्य अनेक तत्त्वों के परस्पर संबंध से प्रकट होता है।”

दुनिया से भागना ब्रह्मचर्य नहीं

मुनिश्री ने कहा कि ब्रह्मचर्य का अर्थ दुनिया से भागना नहीं है। धर्म संसार से पलायन नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए अपनी शक्ति बढ़ाने की कला सिखाता है।

उन्होंने कहा, “निमित्त से भागो मत, निमित्त को ठुकराओ मत। निमित्त से कार्य करना सीखो।” भगवान, गुरु, परिवार, समाज, मित्र अथवा विपरीत परिस्थितियां—जीवन में आने वाला हर निमित्त अपनी किसी शक्ति को जागृत करने का अवसर बन सकता है।

मन को रोकना नहीं, शक्ति बढ़ाना है

मुनिश्री ने कहा कि केवल मन का किसी दिशा में जाना व्यक्ति के पतन का कारण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि मन जिस अनुभव से होकर लौटा, उससे चिंतन, विवेक, साहस और समझ में कितनी वृद्धि हुई।

उन्होंने कहा कि सम्यक दृष्टि वाला व्यक्ति हर अनुभव से ज्ञान और आत्मिक कमाई लेकर लौटता है। जहां दो वस्तुओं का संयोग हो, वहां नई शक्ति और नई ऊर्जा का निर्माण होना चाहिए।

इंद्रियां बुरी नहीं, उपयोग सही होना चाहिए

मुनिश्री ने कहा कि इंद्रियां अपने आप में बुरी नहीं हैं। आंखों से भगवान के दर्शन, शास्त्रों का अध्ययन और ज्ञान की प्राप्ति होती है; कानों से धर्मश्रवण होता है और मन से चिंतन संभव होता है।

उन्होंने कहा, “आंखों का भी ब्रह्मचर्य है।” आंख केवल विषयों का भोग कर वापस न आए, बल्कि ज्ञान का भंडार बढ़ाकर लौटे। इसी प्रकार कानों से सुना हुआ ज्ञान बढ़ाए, मन का चिंतन विवेक जगाए और शरीर का प्रत्येक कार्य सामर्थ्य का विकास करे।

शक्ति अर्जित करने की साधना है ब्रह्मचर्य

मुनिश्री ने कहा कि ब्रह्मचर्य केवल किसी वस्तु को छोड़ देने का नाम नहीं, बल्कि अपनी सुप्त शक्ति को जागृत और विकसित करने की साधना है। प्रत्येक अनुभव के बाद स्वयं से पूछना चाहिए कि इससे ज्ञान, सोच, चिंतन और आत्मबल में क्या वृद्धि हुई।

उन्होंने कहा कि सम्यक ज्ञानी संसार में रहते हुए भी संसार में खोता नहीं है। वह प्रत्येक निमित्त और परिस्थिति को आत्मिक उन्नति का साधन बना लेता है।

धर्मसभा में आनंद-नवीन गोधा, सपना-मनीष गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन, आकाश-आलोक कोयला, प्रिंसिपल टोंग्या, संजय पाटोदी, हुकुमचंद जैन, अक्षय कासलीवाल, धर्मेंद्र जैन, गिरीश जैन ‘गिन्नी’, प्रदीप, पारस भैया ब्रह्मचारी, विनोद भैया, विजय धुर्रा एवं डॉ. जैनेन्द्र जैन सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।

एक नजर में

मिथुन चक्र को दो तत्त्वों की परस्पर पूरकता के रूप में समझाया गया।

ब्रह्मचर्य को पलायन नहीं, आत्मशक्ति बढ़ाने की साधना बताया गया।

हर निमित्त एवं परिस्थिति से सीख लेकर आगे बढ़ने का संदेश दिया गया।

इंद्रियों के विवेकपूर्ण उपयोग को ब्रह्मचर्य का अंग बताया गया।

आत्मचिंतन के माध्यम से ज्ञान, विवेक और सामर्थ्य बढ़ाने का आह्वान किया गया।

श्रीफल साथी : राजेश जैन दद्दू, इंदौर