धरियावद। भक्तामर महाविधान के 48 दिवसीय आयोजन के 21वें दिन पुण्यार्जक परिवारों सहित श्रावक-श्राविकाओं ने भक्तिभाव एवं मंगलमय वातावरण में आराधना की। विधि-विधानपूर्वक पूजन कर मंडप पर 48 अर्घ्य समर्पित किए गए। विधान के बाद धर्मसभा में आचार्य कल्प पुण्यसागर जी महाराज ने अपने पूर्व दिवस के प्रवचन “अंधा कौन?” को आगे बढ़ाते हुए राग और मोह की गहन व्याख्या की। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के जीवन में राग अर्थात मोह की तीव्रता अधिक होती है, वह आंखें होते हुए भी अंधा होता है। आचार्य श्री ने कहा कि राग के वशीभूत व्यक्ति को अच्छे-बुरे का विवेक नहीं रहता। उसकी आंखें खुली होने के बावजूद उसका विवेक नेत्र बंद हो जाते हैं और वह सही-गलत का निर्णय करने में असमर्थ हो जाता है। मोह और आसक्ति व्यक्ति की निर्णय क्षमता को प्रभावित कर देते हैं।

विवेक, संयम और सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए

आचार्य कल्प ने कहा कि संसार की दशा बड़ी विचित्र है। पुराणों की कथाओं पर दृष्टि डालें तो अनेक प्रसंगों के पीछे राग और मोह ही प्रमुख कारण दिखाई देते हैं। महाभारत हो या रामायण, मोह और आसक्ति के कारण ही अनेक घटनाओं ने जन्म लिया। रागी व्यक्ति मोह के वशीभूत होकर ऐसे निर्णय कर बैठता है, जिनका परिणाम बाद में दुख और पश्चाताप के रूप में सामने आता है। राग संसार में रुलाने वाला और कष्ट देने वाला है। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में राग और मोह को धीरे-धीरे कम करते हुए विवेक, संयम और सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। इसके लिए निरंतर प्रयास, प्रयत्न और पुरुषार्थ आवश्यक है। जब मोह का पर्दा हटता है, तभी आत्मा को सही दिशा और जीवन को सत्य पथ प्राप्त होता है। धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने आचार्य श्री के प्रवचनों को श्रद्धापूर्वक सुना और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।