मुरैना। दिगंबर जैन परंपरा में दशलक्षण महापर्व के दौरान मनाई जाने वाली धूप दशमी का विशेष धार्मिक महत्व है। इस वर्ष 21 सितंबर, सोमवार को धूप दशमी का पर्व श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाएगा। इस अवसर पर जिनालयों में भगवान जिनेंद्र का अभिषेक, पूजन एवं आराधना कर श्रद्धालु सुगंधित धूप अर्पित करेंगे।
ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि दशलक्षण महापर्व भाद्रपद शुक्ल पंचमी से अनंत चतुर्दशी तक चलता है। भाद्रपद शुक्ल दशमी को धूप दशमी मनाई जाती है, जो पर्व का छठा दिन है।
धूप की सुगंध की तरह जीवन में फैले सदाचार
डॉ. जैन ने बताया कि धूप अर्पित करने का उद्देश्य केवल वातावरण को सुगंधित करना नहीं, बल्कि इसके माध्यम से आत्मा के भीतर व्याप्त राग-द्वेष और कषायों को दूर करने की भावना करना है।
जिस प्रकार धूप की सुगंध चारों ओर फैलती है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में सदाचार, संयम, अहिंसा और धर्माचरण की सुगंध समाज में फैलनी चाहिए।
जिनालयों में होगा अभिषेक-पूजन और धूप अर्पण
धूप दशमी पर श्रद्धालु प्रातः जिनालय पहुंचकर भगवान जिनेंद्र के दर्शन, अभिषेक एवं पूजन करेंगे। इसके बाद शुद्ध एवं अहिंसक सामग्री से निर्मित धूप अर्पित करते हुए आत्मशुद्धि की भावना करेंगे।
इस दौरान णमोकार महामंत्र का जाप, जिनवाणी का स्वाध्याय और दशलक्षण धर्म से संबंधित ग्रंथों का वाचन भी किया जाएगा। श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार उपवास, एकासन एवं अन्य तप-साधना करेंगे।
राग-द्वेष और कषायों को शांत करने की भावना
धूप अर्पित करते समय श्रद्धालु भावना करेंगे कि उनके जीवन में सम्यक्दर्शन, सम्यक्ज्ञान, सम्यक्चरित्र और संयम की सुगंध फैले। साथ ही राग-द्वेष एवं कषाय शांत हों और आत्मा शुद्धता की ओर अग्रसर हो।
‘धूप बाहर जलती है, साधना भीतर होनी चाहिए’
धूप दशमी का आध्यात्मिक संदेश बाहरी क्रिया के साथ आंतरिक परिवर्तन से जुड़ा है। धूप बाहर जलती है, लेकिन साधना भीतर होनी चाहिए।
जिस प्रकार धूप का धुआं ऊपर की ओर उठता है, उसी प्रकार व्यक्ति को विषय-विकारों से ऊपर उठकर आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने की भावना करनी चाहिए।





