दिल्ली। पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्मसभा में विचार, शब्द, साहित्य और सकारात्मक सोच के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के आंतरिक भावों की अभिव्यक्ति भाषा के माध्यम से होती है और विचारों का प्रकटीकरण ही साहित्य के रूप में साकार होता है।

श्रेष्ठ विचारों से जन्म लेता है श्रेष्ठ साहित्य

पट्टाचार्यश्री ने कहा कि विचारशील एवं परोपकारी व्यक्ति ही साहित्य का सृजन कर सकता है। सद्विचारों की शाब्दिक अभिव्यक्ति साहित्य है और श्रेष्ठ साहित्य पाठक को भी श्रेष्ठ बनने की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि संस्कृति के उद्योतन, संरक्षण और संवर्धन तथा जन-जन के उपकार के लिए विचारशील, गुणवान, समदर्शी और करुणावान व्यक्तित्व श्रेष्ठ साहित्य की अमूल्य निधि समाज को प्रदान करते हैं। श्रेष्ठता प्राप्त करनी है तो श्रेष्ठ साहित्य का पारायण कर उसका चिंतन-मनन करना चाहिए।

गुरु की एक प्रेरणा बदल देती है दिशा

पट्टाचार्यश्री ने कहा कि जब भावितव्यता पवित्र होती है तो व्यक्ति को अच्छे संयोग भी मिलते हैं। सच्चे गुरु की एक प्रेरणा जीवन की दशा और दिशा बदल सकती है, जैसे सूर्य की एक किरण अंधकार को दूर कर उजास भर देती है।

उन्होंने कहा कि जब एक सद्वाक्य मनुष्य को प्रेरित कर सकता है, तो शास्त्रों का अध्ययन और मनन जीवन को महान बनाने की दिशा दे सकता है।

सही विचार सबके लिए उपहार

उन्होंने कहा कि सकारात्मक विचार सुख, समृद्धि और सफलता के मूल स्तंभ हैं। सही विचार स्वयं की चिंताओं को कम करते हैं, आत्मविश्वास बढ़ाते हैं और व्यक्ति को आशावादी बनाते हैं।

पट्टाचार्यश्री ने कहा कि विवादों से बचने और शांति का मार्ग अपनाने के लिए सकारात्मक चिंतन आवश्यक है। सकारात्मक विचारों से व्यक्ति स्वयं के साथ दूसरों के लिए भी उपहार बन सकता है।

श्रीफल साथी : अभिषेक अशोक पाटील, कोल्हापुर