दिल्ली। ऋषभ विहार में विराजित दिगंबर जैन श्रमण-संस्कृति के उन्नायक परम पूज्य पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने ‘प्रतिष्ठा शिरोमणि ग्रंथ-संगोष्ठी’ सभा में प्रतिष्ठाचार्य के गुण, प्रतिष्ठा-विधि तथा आत्मा और शरीर के स्वरूप पर मार्गदर्शन दिया।
उन्होंने कहा कि प्रतिष्ठा जैसे पवित्र कार्य का अधिकारी वही व्यक्ति हो सकता है, जो स्वयं अनुशासित, तेजस्वी, विधि-विधान का ज्ञाता और चारित्रवान हो।
सर्वगुण संपन्न हो प्रतिष्ठाचार्य
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि श्रेष्ठ प्रतिष्ठाचार्य वह है, जो स्वयं में प्रतिष्ठित, अनुशासित, तेजवान और ओजवान हो। उसके पास मधुर कंठ, विधि-विधान का ज्ञान, मंत्रों की समझ, शास्त्रज्ञान और ज्योतिष का विवेक होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बाहरी योग्यता के साथ आचरण की शुद्धता अत्यंत आवश्यक है। चारित्रवान व्यक्ति ही प्रतिष्ठा कराने का वास्तविक अधिकारी हो सकता है।
सिद्धि के लिए आवश्यक है विशुद्धि
गुरुदेव ने कहा कि लोभ-वृत्ति, भोगाकांक्षा, कषाय, कलुषित भाव और कलह से किसी भी धार्मिक कार्य की सिद्धि नहीं होती। पात्र, विधि, साधन, स्थान और समय के परिवर्तन से कार्य के परिणामों में भी अंतर आ सकता है।
उन्होंने कहा कि सिद्धि के लिए पुण्य के साथ भावों की विशुद्धि आवश्यक है। श्रद्धा, विनय और शुद्ध परिणामों से किया गया कार्य ही सार्थकता प्राप्त करता है।
मंत्र, तंत्र और यंत्र का प्रयोग गुरु-उपदेशानुसार हो
पट्टाचार्य श्री ने प्रतिष्ठा के संदर्भ में मंत्र, तंत्र और यंत्रों के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि मूर्ति एवं मंदिर प्रतिष्ठा में इनका प्रयोग विधिपूर्वक होता है। उनके अनुसार मंत्र-जाप से साधक को ऊर्जा प्राप्त होती है और भावपूर्वक किया गया जाप ताप, संताप तथा पाप के क्षय का निमित्त बनता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि मंत्र, तंत्र एवं यंत्रों का प्रयोग सदैव गुरु के उपदेश और शास्त्रोक्त विधि के अनुसार करना चाहिए। प्रत्येक बीजाक्षर का अपना विशेष महत्व होता है।
आत्मा त्रिकालिक, शरीर नश्वर
द्रव्य एवं पर्याय के विषय में गुरुदेव ने कहा कि पर्याय परिवर्तनशील होती है, जबकि द्रव्य त्रिकालिक होता है। आत्मा चेतन और त्रिकालिक है, वहीं मनुष्यादि पर्यायें तथा शरीर नश्वर एवं जड़ हैं।
उन्होंने कहा कि इस भेद-विज्ञान को समझकर जीव को आत्मस्वरूप की ओर उन्मुख होना चाहिए।
श्रीफल साथी : अभिषेक अशोक पाटील




