दिल्ली। “कुटिलता छोड़ो, सरल बनो। जीवन में जो जितना सहन कर लेता है, वह उतनी ही ऊंचाइयों को प्राप्त करता है। संकटों में धैर्यपूर्वक सहन करने वाला व्यक्ति शक्तिशाली बनता है।” धर्मसभा को संबोधित करते हुए पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को विचार, भाव और आचरण की शुद्धता का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति का जीवन उसके विचारों के अनुरूप बनता है। विचारों की पवित्रता व्यक्ति को ऊंचाई की ओर ले जाती है, जबकि विचारों की निम्नता उसके जीवन और व्यवहार को प्रभावित करती है। जो अपने विचारों को संभाल लेता है, उसका जीवन स्वयं संभलने लगता है।
‘शल्य छोड़ो, समाधि अपनाओ’
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि मन में लगातार संकल्प-विकल्प, अशांत कल्पनाएं, कुपित परिणाम और पश्चाताप रहने पर व्यक्ति शांति से नहीं जी सकता। जो बातें अशांति, चिंता और दुःख का कारण बनें, उनसे प्रयत्नपूर्वक दूर रहना चाहिए।
उन्होंने जीवन के लिए सूत्र दिए—“अहं छोड़ो, नम्र बनो। चिंता छोड़ो, चिंतन करो। संग्राम नहीं, समझौता करना सीखो। हिंसा छोड़ो, अहिंसक बनो और प्रमाद छोड़कर जागृतिपूर्वक कार्य करो।”
वैराग्य और तप-साधना का मार्ग कठिन
मुनिश्री ने कहा कि सांसारिक जंजाल से निकलकर वैराग्यपूर्वक तप-साधना करना अत्यंत कठिन है। मनुष्य भव, उच्च विचार, श्रेष्ठ आचरण, भक्ति, तप-संयम, सल्लेखना, आत्मलीनता और समाधि दुर्लभ उपलब्धियां हैं।
व्यक्ति को इनकी महत्ता समझकर जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाना चाहिए।
‘भाव संभालो, भव सुधार लेंगे’
कारण और कार्य के संबंध को समझाते हुए पट्टाचार्य श्री ने कहा कि लक्षण से लक्ष्य और कारणों से कार्य का बोध होता है। व्यक्ति की भाषा, वेश, भोजन और व्यवहार से भी उसके अंतरंग भावों की झलक मिलती है।
उन्होंने कहा कि भावों के अनुरूप ही फल प्राप्त होते हैं। इसलिए भाव संभालो, भव सुधर जाएंगे।
जगत के प्रपंचों और निरंतर संकल्प-विकल्पों में उलझा चित्त शांति और विशुद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता। आत्मिक शांति के लिए अनावश्यक चिंताओं से निकलकर शुद्ध चिंतन की ओर बढ़ना आवश्यक है।
‘ज्ञान ही प्रकाश है’
ज्ञान की महत्ता बताते हुए पट्टाचार्य श्री ने कहा कि ज्ञान ही प्रकाश है। ज्ञानाभ्यास से परिणामों में विशुद्धता आती है और व्यक्ति को हित-अहित का विवेक प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा कि संसार में ज्ञान के समान उपयोगी संपदा दूसरी नहीं है। ज्ञान वैराग्य की दिशा दिखाता है और स्वाध्याय आत्मशांति एवं मुक्ति की साधना में सहायक बनता है।
‘परिणाम संभल गए तो पर्याय संभल जाएगी’
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि हिंसक और अशुद्ध परिणाम अशांति का कारण बनते हैं, जबकि क्षणभर का विशुद्ध परिणाम भी आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा—“परिणाम संभल गए तो पर्याय संभल जाएगी। भावों का परिवर्तन ही जीवन को प्रभावी बनाता है। भाव बदलते हैं तो जीवन बदलता है।”
वर्तमान के भाव भविष्य के आचरण और जीवन की दिशा तय करते हैं, इसलिए मनुष्य को हर समय अपने परिणामों के प्रति जागरूक रहना चाहिए।
‘दृष्टि बदलो, सृष्टि बदली नजर आएगी’
अनेकांत दृष्टि का महत्व बताते हुए पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने कहा कि जीवन में आनंद चाहते हैं तो विषय और परिस्थितियों को अनेकांत दृष्टि से देखने का अभ्यास करें।
उन्होंने संदेश दिया—“एकांत दृष्टि में दुःख है, अनेकांत में आनंद है। दृष्टि बदलो, सृष्टि बदली नजर आएगी।”




