मुरैना। नगर के बड़े जैन मंदिर में नित्य प्रतिदिन धर्मसभा में आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज के प्रवचनों का लाभ समाजजन ले रहे हैं। आचार्यश्री ने वात्सल्य अंग की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन धर्म में साधर्मी के प्रति प्रेम, करुणा, आत्मीयता और शुभभाव रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें अपने मन में किसी भी साधर्मी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट, मायाचारी अथवा बुरे परिणाम नहीं रखना चाहिए। जीवन में सच्चे धर्म की पहचान तभी होती है, जब हमारे व्यवहार में धर्म दिखाई दे। आचार्यश्री ने कहा कि वात्सल्य का अर्थ केवल किसी के प्रति प्रेम प्रदर्शित करना नहीं है, बल्कि दूसरे के सुख-दुःख को अपने सुख-दुःख के समान अनुभव करना है। यदि सामने वाला व्यक्ति सुखी है तो उसके सुख में प्रसन्न होना और विपत्ति में उसके साथ खड़े रहना ही वास्तविक वात्सल्य है। वात्सल्य में स्वार्थ नहीं होता। जहां अपने लाभ की अपेक्षा समाप्त हो जाती है और दूसरे के हित की भावना जागृत होती है, वहीं से सच्चे वात्सल्य का जन्म होता है।

श्रेणिक के प्रसंग से समझाया वात्सल्य का असल महत्व

आचार्यश्री ने श्रेणिक चरित्र का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक बार दो महिलाओं, देवरानी और जेठानी के बीच एक बालक को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। बालक वास्तव में देवरानी का था लेकिन जेठानी ने अलग रहने की बात कहते हुए बालक को अपना पुत्र बताते हुए उस पर अधिकार जताया। दोनों महिलाएं अपने-अपने दावे को लेकर राजा श्रेणिक के पास पहुंचीं। वहां भी दोनों बालक को अपना ही पुत्र बताती रहीं। मामला अत्यंत उलझ गया और यह तय करना कठिन हो गया कि बालक की वास्तविक मां कौन है। इस विवाद का समाधान राजा श्रेणिक के पुत्र अभय कुमार ने करने का निर्णय लिया। उन्होंने दोनों महिलाओं को अगले दिन आने के लिए कहा। अगले दिन अभय कुमार ने जल्लाद को आदेश दिया कि इस बालक के दो टुकड़े करके दोनों महिलाओं को आधा-आधा दे दिया जाए। आदेश सुनते ही दोनों महिलाओं की स्थिति बदल गई लेकिन, वास्तविक मां का वात्सल्य उसके शब्दों में तत्काल प्रकट हो गया। देवरानी ने कहा-बालक को जेठानी को ही दे दीजिए लेकिन, इसके टुकड़े मत कीजिए। अभय कुमार तुरंत समझ गए कि बालक की वास्तविक मां कौन है। उन्होंने कहा कि सच्ची मां अपने अधिकार से अधिक अपने बच्चे के जीवन को महत्व देती है। मां के लिए यह स्वीकार करना कठिन हो सकता है कि उसका बच्चा उससे दूर चला जाए, लेकिन वह अपने बच्चे के प्राणों की रक्षा के लिए अपना अधिकार तक छोड़ सकती है। इसके बाद अभय कुमार ने बालक उसकी वास्तविक मां को सौंप दिया और झूठा दावा करने वाली जेठानी को दंडित किया

सच्चा वात्सल्य परीक्षा की घड़ी में सामने आता है

आचार्यश्री ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि सच्चा वात्सल्य परीक्षा की घड़ी में सामने आता है। केवल मीठे शब्द बोलना, सामने प्रेम दिखाना अथवा रिश्तों की दुहाई देना वात्सल्य नहीं है। जब दूसरे के हित के लिए हम अपने स्वार्थ का त्याग करते हैं, तब वात्सल्य की वास्तविक अनुभूति होती है। उन्होंने कहा कि आज मनुष्य छोटी-छोटी बातों को लेकर एक-दूसरे से नाराज हो जाता है। परिवार हो या समाज, अनेक विवादों का मूल कारण स्वार्थ, अहंकार, अपेक्षा और परस्पर अविश्वास है। यदि व्यक्ति अपने भीतर वात्सल्य का भाव विकसित कर ले तो बहुत से विवाद अपने आप समाप्त हो सकते हैं। हमें यह विचार करना चाहिए कि मेरे कारण किसी साधर्मी को दुःख तो नहीं पहुंच रहा, मेरे व्यवहार से किसी के मन में पीड़ा तो उत्पन्न नहीं हो रही और मेरे शब्द किसी के हृदय को चोट तो नहीं पहुंचा रहे। सभी को अपने जीवन में छल-कपट और मायाचारी का त्याग कर सरलता, विनम्रता और निष्कपटता को अपनाना चाहिए। साधर्मी के प्रति मन में भी शुभभाव रखें, किसी की उन्नति देखकर ईर्ष्या न करें और किसी के दुःख में संवेदना के साथ उसके साथ खड़े हों।

सद्भाव और एकता का वातावरण निर्मित करें

आचार्यश्री उदारसागर जी ने कहा कि जहां वात्सल्य है, वहां बैर समाप्त होता है। जहां आत्मीयता है, वहां दूरी मिटती है और जहां निष्कपटता है। वहां धर्म का वास्तविक प्रभाव दिखाई देता है। इसलिए प्रत्येक श्रावक को अपने व्यवहार में वात्सल्य को स्थान देकर साधर्मी समाज में प्रेम, सद्भाव और एकता का वातावरण निर्मित करना चाहिए। यही वात्सल्य अंग की वास्तविक साधना और सार्थकता है।