देहरा-तिजारा। विश्व प्रसिद्ध अतिशय क्षेत्र देहरा-तिजारा में राष्ट्रयोगी आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी महामुनिराज का 31वां पावन चातुर्मास आध्यात्मिक वातावरण में चल रहा है। प्रतिदिन धर्मसभा, प्रवचन एवं विभिन्न आध्यात्मिक गतिविधियों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु सहभागी होकर वीतराग वाणी का श्रवण कर रहे हैं।

चौदह गुणस्थान आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा का क्रम

मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन एवं प्रचार मंत्री उमंग जैन ने बताया कि धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज ने जैन आगम में प्रतिपादित चौदह गुणस्थानों की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने बताया कि गुणस्थान आत्मा की आध्यात्मिक अवस्थाओं को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इनके माध्यम से सम्यक दर्शन, ज्ञान, चारित्र तथा कषायों से मुक्ति की दिशा में जीव की प्रगति को समझा जा सकता है।

अज्ञान और मोह से संसार परिभ्रमण

आचार्य श्री ने कहा कि संसार में अनंत जीव जन्म-मरण के चक्र में भ्रमण कर रहे हैं। यह संसार परिभ्रमण किसी दूसरे के कारण नहीं, बल्कि जीव के स्वयं के अज्ञान, मोह और कर्मों के कारण है। जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर बाहरी पदार्थों में सुख तलाशता है और विषय-कषायों में उलझकर संसार में बार-बार जन्म लेता है।

उन्होंने कहा कि धन, पद, प्रतिष्ठा, परिवार और सांसारिक उपलब्धियां सुविधाएं दे सकती हैं, लेकिन आत्मा को स्थायी शांति और मुक्ति नहीं दे सकतीं। स्थायी सुख आत्मा के शुद्ध स्वरूप की पहचान और उसके अनुरूप पुरुषार्थ से प्राप्त होता है।

ज्ञान की ज्योति से आत्मा का विकास

आचार्य श्री ने कहा कि जीव जब अज्ञान और मिथ्यात्व की अवस्था से निकलकर सम्यक दर्शन की ओर बढ़ता है, तभी उसकी वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ होती है। धीरे-धीरे सम्यक श्रद्धा, ज्ञान और चारित्र की वृद्धि होती है तथा मोहनीय कर्म एवं कषायों की शक्ति कमजोर होती जाती है।

गुणस्थानों का अध्ययन केवल शास्त्रीय ज्ञान के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर झांकने के लिए होना चाहिए। व्यक्ति को प्रतिदिन आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि उसके भीतर क्रोध, मान, माया और लोभ कितना कम हुआ तथा आत्मा के प्रति जागरूकता कितनी बढ़ी।

बाहरी विकास नहीं, आत्मिक उन्नति महत्वपूर्ण

आचार्य श्री ने कहा कि वर्तमान में मनुष्य बाहरी विकास को ही जीवन की सफलता मान रहा है, जबकि वास्तविक विकास आत्मा के भीतर होना चाहिए। भौतिक सुविधाएं बढ़ने के बावजूद यदि जीवन में शांति, संयम और संतोष नहीं है तो उसे वास्तविक उन्नति नहीं कहा जा सकता।

अज्ञान के कारण जीव शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेता है। शरीर से जुड़े संबंधों और वस्तुओं में आसक्ति के कारण कर्मों का बंध होता है और जीव संसार में भ्रमण करता रहता है। जिनवाणी इस भ्रम से बाहर निकलकर आत्मस्वरूप को पहचानने का मार्ग दिखाती है।

अरिहंत और सिद्ध अवस्था की व्याख्या

आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि सिद्ध परमेष्ठी की अवस्था गुणस्थानातीत है। सिद्ध भगवान समस्त कर्मों से पूर्णतः मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं। अरिहंत परमेष्ठी देहधारी होते हुए चार घातिया कर्मों का पूर्ण क्षय कर सर्वज्ञ एवं वीतराग अवस्था प्राप्त कर चुके होते हैं।

सिद्ध परमेष्ठी शरीर और समस्त कर्मबंधन से रहित होकर सिद्धशिला पर अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य से युक्त परम अवस्था में विराजमान हैं।

अपने गुणों की वृद्धि करना ही सच्चा पुरुषार्थ

आचार्य श्री ने कहा कि दूसरे व्यक्ति में दोष ढूंढना आसान है, लेकिन अपने भीतर के दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करना ही वास्तविक साधना है। क्रोध के समय क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनय, छल-कपट के स्थान पर सरलता और लोभ के स्थान पर संतोष को अपनाना आत्मिक परिवर्तन की शुरुआत है।

उन्होंने कहा कि धर्म केवल मंदिर जाने, पूजा करने या प्रवचन सुनने तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है, जब वीतराग वाणी सुनने के बाद व्यक्ति के व्यवहार, विचार, वाणी और आचरण में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे।

चातुर्मास आत्मचिंतन और आत्मपरिवर्तन का अवस

आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत मूल्यवान है। चातुर्मास केवल धार्मिक आयोजन का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मपरिवर्तन का अवसर है। इस दौरान प्रत्येक व्यक्ति को अपनी कषायों को कम करने, धर्म के प्रति श्रद्धा मजबूत करने और आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने का संकल्प लेना चाहिए।

देहरा-तिजारा बना धर्म और आत्मचिंतन का केंद्र

देहरा-तिजारा में चल रहे 31वें पावन चातुर्मास के दौरान धार्मिक वातावरण निरंतर गहरा हो रहा है। आचार्य श्री के सान्निध्य में आयोजित धर्मसभाओं में आसपास के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंच रहे हैं और जिनवाणी श्रवण के साथ विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों में सहभागी बन रहे हैं।

इस अवसर पर मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन, महामंत्री नरेंद्र जैन, कोषाध्यक्ष शिंभू जैन, प्रचार मंत्री उमंग जैन, चातुर्मास अध्यक्ष सुरेश जैन, रवि जैन, सोनू जैन, वरुण जैन, ललित जैन, अंशुल जैन एवं पवन जैन सहित बड़ी संख्या में समाजजन, धर्मप्रेमी एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।