भिलुडा के निकट शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने कहा कि भाव लब्धि के बिना सम्यक्त्व संभव नहीं है। उन्होंने विनय, गुरु भक्ति और आत्मशुद्धि के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। पढ़िए अजीत कोठिया की खबर 
भिलुड़ा । भिलुडा के पास स्थित शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनक नंदी जी गुरुदेव ने कहा कि भाव लब्धि के बिना सम्यक्त्व की प्राप्ति संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि जो शिष्य के अनुग्रह में कुशल होता है, वही सच्चा धर्माचार्य कहलाता है।विनय से विकसित होते हैं गुरु के गुण

गुरुदेव ने कहा कि विनय से ही आचार्य के गुण उत्पन्न होते हैं और विनय से ही प्रायश्चित का मार्ग खुलता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे खाली बर्तन को भरने के लिए उसे नीचे रखना पड़ता है, उसी प्रकार ज्ञान प्राप्त करने के लिए शिष्य को विनम्र भाव से गुरु के चरणों में जाना पड़ता है।

आत्मशुद्धि का माध्यम है विनय

उन्होंने कहा कि विनय आत्मा की शुद्धि का महत्वपूर्ण साधन है। विनय से कर्मों का क्षय होता है और व्यक्ति कलह, विवाद तथा मानसिक तनाव से मुक्त होता है। विनयवान व्यक्ति में मान, माया और अहंकार का अभाव हो जाता है तथा लघुता का गुण विकसित होता है।

दिखावे से नहीं, सरलता से आता है विनय

धर्माचार्य ने कहा कि केवल बाहरी क्रियाकांड और दिखावे से विनय गुण प्रकट नहीं होता। इसके लिए सरलता, नम्रता और निष्कपट भाव आवश्यक हैं। जो व्यक्ति वास्तव में विनीत होता है, उसमें लोभ, घमंड और तिरस्कार की भावना नहीं रहती।

गुरु अज्ञान का अंधकार दूर करते हैं

उन्होंने कहा कि अध्यात्म को समझना सबसे कठिन कार्य है। जो मोह रूपी अंधकार को दूर कर सही मार्ग दिखाए, वही गुरु कहलाता है। गुरु का सान्निध्य मन के तनाव और भ्रम को समाप्त कर जीवन में नई दिशा प्रदान करता है।

आलस्य और प्रमाद से बचने का संदेश

गुरुदेव ने आलस्य को महादोष बताते हुए कहा कि प्रमादी व्यक्ति कभी आदर्श शिष्य नहीं बन सकता। इंद्रियों और मन पर नियंत्रण रखने वाला ही ध्यान और साधना में सफलता प्राप्त कर सकता है।

निंदा और क्रोध से दूर रहने की सीख

वेबीनार में उन्होंने कहा कि दूसरों के दोषों का प्रचार करना निंदा है और यह आध्यात्मिक प्रगति में बाधक बनता है। सच्चा शिष्य क्षमाशील, नम्र और संयमी होता है। वह क्रोध के अवसर आने पर भी स्वयं को नियंत्रित रखता है और किसी का तिरस्कार नहीं करता।

गुरु के प्रति सम्मान बनाए रखना चाहिए

गुरुदेव ने कहा कि यदि कभी गुरु के मुख से कोई शब्द त्रुटिवश निकल जाए, तब भी उनकी निंदा नहीं करनी चाहिए। अच्छा शिष्य अपने गुरु और मित्रों के प्रति सम्मान बनाए रखता है तथा उनके गुणों का ही वर्णन करता है।

मंगलाचरण से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम की शुरुआत मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव द्वारा आचार्य श्री रचित कविता—

"मने तो लड़ाई झगड़ा नहीं आवे,

मने तो समता, शांति, सत्य भावे"

के मंगलाचरण से हुई। इस अवसर पर उपस्थित श्रोताओं ने आध्यात्मिक संदेशों को आत्मसात करने का संकल्प लिया।