असीमित आनंद की प्राप्ति के लिए हमें अपनी इच्छाओं को सीमित करना होगा मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज
संवाददाताShreephal Jain Newsइंदौर
न्यूज सौजन्य - राजेश जैन दद्दूइंदौर। कहते है इंद्रिय विषयों के प्रति आसक्ति संयम नहीं है और इसकी आसक्ति मैं भी सुख नहीं है। इंद्रिय विषयों के प्रति विरक्ति का नाम संयम है। संयम में सुख और असीमित आनंद तो असंयम में दुख और संकलेषता है। हमें इसी आनंद की प्राप्ति के लिए अपनी इच्छाओं को सीमित करना होगा यह विचार मुनिश्री आदित्य सागर जी महाराज ने कंचनबाग स्थित समवशरण मंदिर में आयोजित धर्म सभा में व्यक्ति किए। नदी का उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने कहा कि नदी का उद्गम पानी की एक पतली धार के रूप में होता है और बीच में विशाल होती है लेकिन सीमित रहते हुए नगर में नहीं घुसती, अपनी सीमा में ही रहती है। तब जाकर सागर में मिलती है। ठीक वैसे ही जीव जब रत्नत्रय का पालन कर इच्छाओं को सीमित करता है तो उसके भीतर भी असीमित आनंद का सागर हिलोरे लेने लगता है।जिसके पास स्वभाव और चरित्र के निर्माण की योजना है उसका भविष्य निर्माण तय है
मुनिश्री ने आगे कहा कि मनुष्य पर्याय मिली है तो व्रत को धारण करें और प्रीति एवं विवेक से व्रत का पालन कर पुण्य का संचय करें। अव्रती बनकर नरक ना जाए, व्रती बन कर स्वर्ग जाना श्रेष्ठ है। शिक्षा और संस्कारों की चर्चा करते हुए आपने कहा कि जिसके पास स्वभाव और चरित्र के निर्माण की योजना है उसका भविष्य का निर्माण होना तय है। जैन समाज को गुरुकुल की स्थापना करना चाहिए ताकि बच्चे यथार्थ ज्ञान और संस्कार प्राप्त कर सकें।
जीवन के विकास के तो कई साधन है लेकिन व्यक्तित्व का विकास गुणों से ही होता है
मीडिया प्रभारी राजेश जैन दद्दू ने बताया धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री सहज सागर जी ने भी प्रवचन देते हुए कहा कि जीवन के विकास के कई साधन है लेकिन अपने व्यक्तित्व का विकास गुणों से ही होता है। नजर का इलाज हो सकता है नजरिए का नहीं डॉक्टर भी तन का इलाज करते हैं लेकिन जिनवाणी मन का इलाज करती है। अतः यथार्थ ज्ञान और गुणों की प्राप्ति के लिए जिनवाणी का स्वाध्याय करें।
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