आगरा। निर्मल सेवा सदन छीपीटोला में दो दिवसीय राष्ट्रीय जैन संगोष्ठी का आयोजन श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के संयोजन में किया गया। इस संगोष्ठी में देशभर से आए विद्वानों ने आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज द्रारा रचित "वस्तुत्व महाकाव्य" पर चर्चा की। सोमवार को पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के तीन अनमोल रत्न परम प्रभावक शिष्य श्रमण मुनि श्री समत्व सागरजी, मुनि श्री शील सागरजी, मुनि श्री सुप्रभात सागर जी ससंघ के सानिध्य में यह आयोजन हुआ। वस्तुत्व महाकाव्य पर विद्वत् संगोष्ठी में अनेक विशिष्ठ विद्वानों ने धर्म के प्रति व्याख्यान किया। जिसमें अनेक सहधर्मियों ने धार्मिक लाभ प्राप्त किया।
भारत की यह साहित्यिक संपदा है
मुनि श्री समत्व सागर जी महाराज ने कहा कि वही संस्कृति अपना अस्तित्व सुरक्षित रख सकती है, जिसके पास में श्रेष्ठ साहित्य और श्रेष्ठ पुरातत्व संपदा हुआ करती है। आज भारत की भूमि क्यों विश्व में आकर्षण का केंद्र बनी हुई है, उसका कोई मूल कारण है तो भारत की पुरातत्व संपदा है और भारत की यह साहित्यिक संपदा है जो आज संपूर्ण विश्व को भारत की ओर आकर्षित कर रही है।
साहित्य राष्ट्र निर्माण में सहयोगी होगा
विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में आज पुनः भारत की ओर दृष्टि की जा रही है, उस भारत की ओर दृष्टि करने का मूल कारण पुरातत्व को तो देखने के लिए लोग आ सकते हैं, लेकिन इस संस्कृति को समझने के लिए इसके साहित्य को समझना होता है। साहित्य जगत वह जगत है जो भविष्य को भी दिखाता है, तो वर्तमान के परिप्रेक्ष्य को स्पष्ट कर देता है और जो अतीत है उसका भी दर्पण मात्र साहित्य में ही दृष्टिगोचर होता है। इसलिए जब हम राष्ट्र निर्माण की बात कर रहे हैं, राष्ट्र निर्माण और किस प्रकार से यह साहित्य राष्ट्र निर्माण में सहयोगी होगा तो साहित्य ही है।
इतिहास से परिचय कराता है यह साहित्य
आज भी अगर हम उठाकर देखें तो भारत का इतिहास मात्र शिलालेखों में अथवा साहित्यिक जो पूर्व में हस्तलिखित प्रतियां लिखी गईं अथवा जो ताड़पत्रों पर हमारे आचार्य भगवंतों ने काम किया, हस्तलिखित प्रतियां लिखी गईं, वही साहित्य आज पूरे भारत को उसके इतिहास से परिचय कराता है। इसलिए जब हम कोई भी साहित्य लिखें तो बहुत जरूरी है कि मात्र वर्तमान को और वर्तमान की भाषा में न लिखा जाए। यह बहुत आवश्यक है।
चित्रांकन बहुत अच्छा कर दिया
सारे वरिष्ठ विद्वान इस बात को रेखांकित किया कि जैसा कि डॉ. वीर सागर जी ने एक विषय को स्पर्श किया और सारे जो नवीन विद्वान हैं, वे इस बात को ध्यान रखें—आपकी कृति मात्र ऐसी न हो कि एक बार हाथ में ली जाए और नीचे रख दी जाए। उसमें यदि सिद्धांत नहीं होंगे, उसमें यदि विषय-वस्तु नहीं होगी और मात्र आकर्षण के लिए वह बहुत अच्छा आपने चित्र बना दिया, चित्रांकन बहुत अच्छा कर दिया। इससे कृतियों की महत्ता नहीं होगी। मूल महत्ता तब होगी जब हम जिन-दर्शन के सिद्धांतों को और जिन-दर्शन के मैं इसलिए नहीं कहना चाहता। जिन-दर्शन के सिद्धांत यदि मैं कहता हूँ तो जिन-दर्शन छोटा होता है। जो सिद्धांत हैं, वे जिन-दर्शन ने प्रतिपादित किए हैं। मंच संचालन सतेंद्र जैन साहूला ने किया।
यह समाजजन मौजूद रहे
संगोष्ठी में राष्ट्रीय जैन विद्वान डा श्रेयांस कुमार जैन, डॉ. अनेकान्त जैन, डॉ.सुरेन्द्र जैन भारती, डॉ. वीरसागर जैन, डॉ. अशोक जैन, प्रतिष्ठाचार्य विनोद जैन रजवांस, प्रो अभिषेक जैन दमोह, सुनील जैन संचय' आशीष जैन शास्त्री, डॉ. नीलम जैन, डॉ. पंकज जैन, महावीर पण्डित, विकर्ष शास्त्री, मनोज जैन बाकलीवाल, श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के मनोज जैन, प्रवीण जैन पद्मावती, विवेक जैन, चक्रेश जैन, राजीव जैन, शैलेश जैन(लालाजी), जगदीश प्रसाद जैन, अनन्त जैन,आनंद जैन,आशु जैन (वी .के), अनिकेत जैन, आशीष जैन (बाबा), सतेंद्र जैन (सोनू), राजू भाई (चचे), अमित जैन, गौरव जैन , पंडित विजय जैन शास्त्री, मीडिया प्रभारी राहुल जैन समस्त मंडल एवं सकल जैन मौजूद था।



