कुण्डलपुर। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य अपने जीवन में जितना दिखाई देता है, उतने को ही संपूर्ण सत्य मान लेता है। वास्तविकता को समझने के लिए बाहरी दृष्टि से आगे बढ़कर यथार्थ को जानना आवश्यक है।
आकाश और धरती का मिलन भी भ्रम
मुनिश्री ने आकाश और धरती के मिलने का उदाहरण देते हुए कहा कि ऊंचाई पर खड़े होकर दूर देखने पर ऐसा लगता है कि किसी स्थान पर आकाश और धरती मिल गए हैं, लेकिन वहां पहुंचने पर ऐसा कोई मिलन दिखाई नहीं देता। आगे बढ़ने पर फिर वही भ्रम दिखाई देता है। यही मृग-मरीचिका है।
उन्होंने कहा कि जब हमारी दृष्टि यथार्थ को नहीं समझ पाती, तब दिखाई देने वाली वस्तु को ही सत्य मान लेने की भूल हो जाती है।
संसार के सुख के पीछे भाग रहा मनुष्य
मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि गर्मी में सड़क पर दूर से पानी दिखाई देता है, लेकिन पास पहुंचने पर सड़क सूखी मिलती है। रेगिस्तान में प्यासा मृग पानी की तलाश में मृग-मरीचिका के पीछे भागता रहता है और अंततः थक जाता है।
इसी प्रकार अज्ञान के कारण मनुष्य भी संसार में सुख, धन और विषयों की प्राप्ति के पीछे भागते-भागते थक रहा है।
सम्यक ज्ञान अत्यंत दुर्लभ
मुनिश्री ने कहा कि शब्दों का ज्ञान और बाहरी दुनिया की जानकारी सहज उपलब्ध है, लेकिन सम्यक ज्ञान और यथार्थ ज्ञान अत्यंत दुर्लभ है। संसार में धन, कनक, कंचन, राज और सुख प्राप्त किए जा सकते हैं, लेकिन वास्तविक ज्ञान प्राप्त करना कठिन है। यह ज्ञान ज्ञानी संतों और गुरुओं के सान्निध्य से प्राप्त होता है।
गुरु जलाते हैं ज्ञान का दीप
ज्ञान के दीपक का उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य के भीतर ज्ञान की संभावना मौजूद है। जैसे दीपक में बत्ती और तेल होने के बावजूद उसे जलाए बिना प्रकाश नहीं होता, उसी प्रकार मनुष्य के भीतर ज्ञान का दीप मौजूद है, लेकिन उसे प्रज्वलित करने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है।
उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा—“ज्योति से ज्योति जलाते चलो और ज्ञान के दीपक जलाते चलो।”
एक दीपक हजारों दीपों को कर सकता है प्रकाशित
मुनि श्री ने कहा कि एक ज्ञान का दीपक हजारों दीपकों को प्रकाशित कर सकता है। इसलिए गुरु और ज्ञानीजनों का सान्निध्य जीवन में प्रकाश पैदा करता है।
उन्होंने कहा कि सागर में डुबकी लगाने पर ही रत्न मिलते हैं, सूरज की अनुकंपा से ही कमल खिलते हैं और विद्या का दीप ऐसा अद्भुत दीप है, जिससे सदैव नए-नए दीप जलते हैं।
वर्षायोग में आत्मचिंतन का संदेश
चातुर्मास और वर्षायोग की चर्चा करते हुए मुनिश्री ने कहा कि सावन का महीना केवल झूला झूलने का अवसर नहीं है, बल्कि अध्यात्म का झूला झूलने, समयसार का चिंतन करने और ज्ञान के आनंद में डूबने का अवसर है।
उन्होंने कहा कि इस वर्षायोग में बाहरी संसार के भ्रम से निकलकर अपने भीतर के ज्ञान-प्रकाश को जागृत करने का संकल्प लेना चाहिए।
19 अगस्त को पार्श्वनाथ मोक्ष कल्याणक
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनिश्री के प्रवचनों से श्रद्धालुओं को आत्मज्ञान, सम्यक दृष्टि और गुरु-सान्निध्य के माध्यम से जीवन को सही दिशा देने की प्रेरणा मिल रही है।
19 अगस्त 2026, मुकुट सप्तमी के अवसर पर मुनि श्री समतासागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में भगवान पार्श्वनाथ के मोक्ष कल्याणक महोत्सव का आयोजन होगा। इस अवसर पर भगवान पार्श्वनाथ का महा मस्तकाभिषेक किया जाएगा तथा निर्वाण लाडू समर्पित किया जाएगा।



