सनावद नगर में आज पर्युषण पर्व के तृतीय दिवस पर नगर गौरव आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज का 76वां वर्षवर्धन दिवस धूमधाम और भक्ति भाव से मनाया गया। इस अवसर पर पंचामृत अभिषेक, शांति धारा, प्रवचन, प्रभावना और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुए। पढ़िए सन्मति जैन काका की ख़ास रिपोर्ट…
सनावद। 20वीं सदी के प्रथमा चार्य, चारित्र चक्रवर्ती की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश, राष्ट्र गौरव वात्सल्य वारिधि तपोनिधि आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज का 76वां वर्षवर्धन आज सनावद नगर में द्वय मुनिराजों के सानिध्य में अत्यंत भव्य और भक्तिमय वातावरण में मनाया गया।

प्रातः काल बड़ा जैन मंदिर और संत निलय में पंचामृत अभिषेक और पूजन श्रद्धालुओं ने पूर्ण भक्ति भाव से किया। इस अवसर पर शांति धारा करने का सौभाग्य सुरेश कुमार, मनीष कुमार, हितेश कुमार और अमर ज्योति बस परिवार को प्राप्त हुआ।

नगर में विराजमान मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज वात्सल्य और तपस्या के साकार रूप हैं। जैसे राम के साथ लक्ष्मण की परछाई चलती रही, वैसे ही आचार्य श्री के पीछे अनेक मुनि संत संयम मार्ग का पालन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री का नाम स्मरण करने मात्र से जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं।

मुनि श्री विश्वसुर्य सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में उत्तम आर्जव धर्म का महत्व बताते हुए कहा कि हमें कपट और माया त्यागकर सरल और सीधा जीवन अपनाना चाहिए।

शाम को भव्य आरती का आयोजन हुआ जिसमें 76 दीपों से आचार्य श्री की आरती की गई। प्रदीप पंचोलिया, प्रशांत चौधरी, प्रांशुल पंचोलिया, कमल केके, संगीता पाटोदी और लक्ष्मी जैन द्वारा आरती की गई। इस अवसर पर “आरती सजाओ” प्रतियोगिता तथा “ज्ञान के चक्षु खोलो” कार्यक्रम भी आयोजित हुए।

आचार्य श्री का जीवन परिचय

18 सितम्बर 1950 को सनावद नगर में जन्मे आचार्य श्री का प्रारंभिक नाम यशवंत कुमार था। 18 वर्ष की आयु में उन्होंने मुनि दीक्षा ग्रहण की और आजीवन संयम पथ पर अग्रसर हुए। आपके सानिध्य में श्रवणबेलगोला का महामस्तकाभिषेक तीन बार संपन्न हुआ। वर्तमान में आप राजस्थान के टोक में विशाल संघ सहित विराजमान हैं। इस अवसर पर सनावद नगरवासियों ने अपार श्रद्धा के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई और आचार्य श्री की दीर्घायु की मंगल कामना की।