इंदौर। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 19 अगस्त बुधवार, श्रावण शुक्ल सप्तमी को देशभर में अत्यंत श्रद्धा और धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। इंदौर सहित सभी दिगंबर जैन मंदिरों, अतिशय क्षेत्रों और सिद्ध क्षेत्रों में इस दिन विशेष पूजन, महामस्तकाभिषेक, वृहद शांतिधारा, अर्घ्य और निर्वाण लाडू चढ़ाने का विधान होगा।

मोक्ष कल्याणक से जुड़ी ग्रंथीय जानकारी

जैन आगमों के अनुसार भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म काशी नगरी में राजा अश्वसेन और रानी वामा देवी के घर हुआ था। उनका चिह्न ’सर्प’ है और शरीर का वर्ण नीला बताया गया है। यक्ष-यक्षिणी मातंग और पद्मावती हैं। प्रभु ने 30 वर्ष की आयु में संसार त्याग कर दीक्षा ली और 84 दिन की कठोर तपस्या के बाद केवलज्ञान प्राप्त किया। 100 वर्ष की आयु में उन्होंने बिहार के सम्मेद शिखर जी से कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को मोक्ष प्राप्त किया था। मोक्ष कल्याणक का स्मरण श्रावण शुक्ल सप्तमी को किया जाता है।

उपदेश और समाजोपयोगी संदेश

भगवान पार्श्वनाथ जी ने मानव कल्याण के लिए चार महाव्रतों का उपदेश दिया - ’अहिंसा, सत्य, अचौर्य और अपरिग्रह’। बाद में भगवान महावीर ने इसमें ब्रह्मचर्य जोड़कर पंच महाव्रत का मार्ग प्रशस्त किया। प्रभु का प्रमुख संदेश था कि क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार कषाय ही आत्मा को बंधन में डालते हैं। इन्हें जीतकर ही मनुष्य मोक्ष पा सकता है। श्रावक-श्राविकाओं के लिए उन्होंने कहा कि दया, दान, शील और संयम से जीवन को साधो। किसी भी जीव को मन, वचन और कर्म से कष्ट मत दो। स्वार्थ छोड़कर परोपकार करो, क्योंकि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

मंगल देशना और धार्मिक प्रभावना

भगवान पार्श्वनाथ की देशना का सार ’अहिंसा परमो धर्मः’ है। उन्होंने कहा कि विचारों में शुद्धि रखो, वाणी में मधुरता रखो और आचरण में सरलता रखो। पर्यावरण, पशु-पक्षी और प्रकृति के प्रति करुणा रखना ही सच्ची पूजा है। 19 अगस्त को मंदिरों में सुबह से निर्वाण लाडू चढ़ाकर भक्त प्रभु के मोक्ष का उत्सव मनाएंगे। स्वाध्याय, उपवास और दान के साथ यह दिन हमें याद दिलाता है कि जीवन का लक्ष्य भोग नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति है।