देहरा-तिजारा (श्रीफल साथी सोनल जैन)। जैन अतिशय क्षेत्र देहरा-तिजारा में 31 साधकों के साथ भावालिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महामुनिराज का मंगलमय चातुर्मास चल रहा है। चातुर्मास के दौरान आचार्यश्री की कठोर साधना एवं संयम के विभिन्न स्वरूपों के श्रद्धालु प्रत्यक्ष साक्षी बन रहे हैं।
आचार्यश्री ने किया केशलोंच
मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन एवं प्रचार मंत्री उमंग जैन ने बताया कि 26 अगस्त की प्रातः बेला में आचार्य गुरुवर श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ने दिगम्बर जैन मुनि की कठिन साधना के अभिन्न अंग केशलोंच को सम्पन्न किया।
आचार्यश्री ने अपने हाथों से सिर तथा दाढ़ी-मूँछ के बालों का केशलोंच करते हुए मुनि जीवन के मूलगुण एवं कठोर संयम का परिचय दिया।
आर्यिका विमर्शिता माताजी सहित तीन शिष्याओं ने भी किया केशलोंच
इस अवसर पर आचार्यश्री की शिष्या आर्यिका विमर्शिता श्री माताजी सहित तीन शिष्याओं ने भी केशलोंच सम्पन्न किया। साधु-साध्वियों की इस कठोर साधना को देखकर उपस्थित श्रावकों की आँखें छलछला उठीं और पूरा वातावरण श्रद्धा एवं भक्ति से भाव-विभोर हो गया।
केशलोंच दिगम्बर मुनि की कठिनतम चर्या : आचार्यश्री
केशलोंच की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज ने कहा कि दिगम्बर जैन मुनिराज की चर्या में यदि कोई कठिनतम चर्या है तो वह केशलोंच करना है। यह चर्या मुनिराज की उत्कृष्ट साधना और कठोर संयम को दर्शाती है।
आचार्यश्री ने बताया कि दिगम्बर मुनिराज अपरिग्रह महाव्रत के धारक होते हैं। वे धन-दौलत तथा गृहस्थोचित किसी भी प्रकार की सामग्री अपने पास नहीं रखते। स्वावलम्बी जीवन जीते हुए जब उनके केश बढ़ जाते हैं, तब 2 से 4 माह के अंतराल में वे अपने हाथों से केशों को उखाड़कर अलग कर देते हैं।
अहिंसा और अपरिग्रह की साधना
आचार्यश्री ने केशलोंच को आवश्यक बताते हुए कहा कि बालों के अधिक बढ़ जाने से उनमें सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति हो सकती है, जिससे उन जीवों की विराधना संभव है। दिगम्बर जैन मुनि अहिंसा महाव्रत के धारी होते हैं। इसलिए वे कृत, कारित एवं अनुमोदना—किसी भी प्रकार से जीवों की हिंसा के कारण नहीं बनते।
शरीर नहीं, आत्मा के श्रृंगार पर जोर
आचार्यश्री ने कहा कि दिगम्बर जैन मुनिराज शरीर के प्रति भी अत्यंत निःस्पृह वृत्ति धारण करते हैं। अनासक्त वृत्ति का परिचय देते हुए वे वस्त्र-आभूषणों से शरीर का संस्कार नहीं करते, बल्कि अंतरंग राग-द्वेष आदि विकारों को जीतते हुए वैराग्य आदि गुणों से अपनी आत्मा का श्रृंगार करते हैं। उनका लक्ष्य आत्मा को एक दिन पूर्ण वीतरागमय बनाना है।
बड़ी संख्या में श्रद्धालु रहे उपस्थित
इस अवसर पर मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन, महामंत्री नरेंद्र जैन, कोषाध्यक्ष शिंभू जैन, चातुर्मास अध्यक्ष सुरेश जैन, प्रचार मंत्री उमंग जैन, अंशुल जैन, नीरज जैन, सचिन जैन, फकीरा मास्टर जी, अमन जैन एवं शैलू जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।



