In_the_journey_of_life,_it_is_not_the_destination_but_one's_perspective_that_determines_the_direction
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सारांशः-
कुण्डलपुर(मप्र)। गति ही जीवन है और जीवन की यात्रा केवल जन्म से मृत्यु तक की भौतिक दूरी तय करना नहीं,बल्कि अनुभवों, सुख-दुख, सफलता-असफलता और चुनौतियों से सीखते हुए स्वयं को जानने की प्रक्रिया है। यह उदगार निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने वाट ए लाइफ प्रवचन श्रृंखला के उपसंहार अवसर पर व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भौतिक यात्रा में केवल स्थान बदलता है, जबकि जीवन की यात्रा में सोच, परिपक्वता और चरित्र बदलते हैं। इस सफर में गुरु, परिवार, मित्र और जीवनसाथी सहयात्री बनकर कुछ दूर तक साथ चलते हैं, लेकिन कुछ रास्ते ऐसे भी होते हैं जिन्हें व्यक्ति को अकेले तय करना पड़ता है। मुनि श्री ने जीवन को ट्रेन की यात्रा के रूपक से समझाते हुए कहा कि जीवन की पटरी पर सभी यात्री चल रहे हैं, लेकिन कोई दुखी और तनावग्रस्त है तो कोई कठिन परिस्थितियों में भी शांत और प्रसन्न दिखाई देता है। इसका कारण परिस्थितियां नहीं, बल्कि उन्हें देखने की दृष्टि है। जीवन में दो ट्रेनें हैं-मिथ्या ट्रेन और सम्यक ट्रेन। मिथ्या ट्रेन का संचालन अज्ञानी गुरु के हाथ में होता है, जबकि सम्यक ट्रेन का स्टीयरिंग ज्ञानी गुरु के हाथ में होता है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक यात्री अपने साथ पिछले जन्मों से संचित कर्मरूपी सामान लेकर आता है। उसकी सीट और यात्रा की समय-सीमा निर्धारित है तथा जीवन में मिलने वाले सहयात्री भी कर्मों के उदय के अनुसार आते-जाते हैं। चलती ट्रेन में अपनी सीट बदलने या बीच रास्ते उतरने का विकल्प नहीं है। इसलिए जीवन में आने वाली परिस्थितियों को समझकर स्वीकार करना और उनके बीच अपनी दिशा बनाए रखना जरूरी है।
पुरानी परिस्थितियों से चिपके रहना जीवन गति को धीमा करता है
मुनि श्री ने कहा कि जीवन की पहली बड़ी चुनौती यह है कि इसमें रिटर्न या यू-टर्न नहीं होता। जो समय और अवसर निकल गया, वह वापस नहीं आता। दूसरी चुनौती अनिश्चितता है। नौकरी छूटना, व्यापार में नुकसान, बीमारी या प्रियजन का बिछुड़ना अचानक आने वाले कठिन मोड़ हैं। भावनात्मक द्वंद्व, आत्मशंका और अकेलापन भी व्यक्ति की आंतरिक परीक्षा लेते हैं। सामाजिक दबाव और दूसरों से तुलना मानसिक शांति छीनते हैं, जबकि बीते सुख-दुख और पुरानी परिस्थितियों से चिपके रहना जीवन की गति को धीमा कर देता है। उन्होंने कहा कि व्यापार में नुकसान होने पर मिथ्या दृष्टि वाला व्यक्ति मंदी, साझेदार या भाग्य को दोष देकर टूट जाता है, क्योंकि उसने अपनी पहचान धन-संपत्ति से जोड़ रखी है। सम्यक दृष्टि वाला व्यक्ति समझता है कि नुकसान तिजोरी में हुआ है, आत्मा में नहीं। वह कर्मों के उदय को स्वीकार करते हुए बिना किसी को दोष दिए न्यूनतम आकुलता के साथ संकट को पार करता है। इसी प्रकार रिश्तों में प्रेम और सद्व्यवहार रखते हुए अत्यधिक आसक्ति से बचता है। सफलता और सम्मान मिलने पर भी वह अहंकार में नहीं डूबता, क्योंकि वह जानता है कि बाहरी सुख-दुख बदलते रहने वाले दृश्य हैं।
सम्यक ट्रेन के यात्रियों को एसी-3, एसी-2 और एसी-1 के रूपक से समझाया
मुनि श्री ने जीवन यात्रा के चार प्रमुख स्टेशनों के रूप में स्वर्ग गति, नरक गति, तिर्यंच गति और मनुष्य गति का उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे आगे सर्वाेच्च स्टेशन सिद्ध नगरी है। सिद्ध नगरी का आनंद और सौंदर्य सांसारिक कल्पनाओं से परे है। इस परमधाम तक केवल सम्यक ट्रेन ही पहुंच सकती है। इसलिए मनुष्य को संसार के क्षणिक दृश्यों में उलझने के बजाय अपनी अंतिम मंजिल को ध्यान में रखकर जीवन की यात्रा करनी चाहिए। उन्होंने सम्यक ट्रेन के यात्रियों को एसी-3, एसी-2 और एसी-1 के रूपक से समझाया। एसी-3 के यात्री अभी प्रमाद से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं, लेकिन भावनाओं, पाठ, स्वाध्याय और चिंतन-मनन के माध्यम से स्वयं को संभालते हैं। एसी-2 के यात्री अनुव्रत और प्रतिमाओं के पालन की दिशा में आगे बढ़ते हैं, जबकि एसी-1 के परम यात्री महाव्रत धारण कर छठे-सातवें गुणस्थान और उससे ऊपर की आध्यात्मिक यात्रा करते हैं।
पंद्रह विषयों वाली सोलह दिवसीय श्रृंखला के रूप में सामने आया
मुनि श्री ने कहा कि सम्यक दृष्टि वाला व्यक्ति भेद-विज्ञान, कर्म सिद्धांत, अनेकांतवाद, अपरिग्रह और ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम की भावना के साथ जीवन जीता है। यही दृष्टि उसे सुख-दुख, लाभ-हानि, मान-अपमान और मिलन-विछोह के बीच संतुलित रखती है। जीवन की खूबसूरती रास्ते के आसान होने में नहीं, बल्कि कठिन रास्तों पर धैर्य और समता के साथ आगे बढ़ने में है। कठिनाइयां व्यक्ति को रोकने के लिए नहीं, बल्कि उसके चरित्र को निखारने और भीतर से मजबूत बनाने के लिए आती हैं। मुनि श्री ने बताया कि वाट ए लाइफ श्रृंखला का विचार लंबे समय से उनके मन में विचार-बिंदुओं के रूप में था। कुण्डलपुर के बड़े बाबा के चरणों और वर्ष 2026 के चातुर्मास वर्षायोग में यह विचार क्रमबद्ध रूप से विकसित होकर एक दिन की भूमिका और पंद्रह दिनों के पंद्रह विषयों वाली सोलह दिवसीय श्रृंखला के रूप में सामने आया। इसमें सामान्य जनजीवन से लेकर स्वाध्याय और साधना तक के महत्वपूर्ण पहलुओं को सरल एवं जीवनोपयोगी ढंग से प्रस्तुत किया गया।
वाट ए लाइफ श्रृंखला ने जैन दर्शन के गहन सिद्धांतों से जोड़ा
श्रृंखला के उपसंहार पर मुनि श्री ने संयोजना में सहयोग देने वाले सभी कार्यकर्ताओं और सहयोगियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की तथा सभी के स्वस्थ, प्रसन्न और मंगलमय जीवन की कामना की। उन्होंने कहा कि बड़े बाबा तथा छोटे बाबा, गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की अदृश्य कृपा और प्रेरणा से यह श्रृंखला सहजता और आनंद के साथ पूर्ण हुई। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि वाट ए लाइफ श्रृंखला ने जीवन के सामान्य अनुभवों को जैन दर्शन के गहन सिद्धांतों से जोड़ते हुए आत्मचिंतन की नई दृष्टि प्रदान की। श्रृंखला का मूल संदेश रहा कि संसार की यात्रा में दृश्य चाहे कितने भी बदलें और सहयात्री आते-जाते रहें, मनुष्य को अपनी वास्तविक पहचान और परम लक्ष्य को कभी नहीं भूलना चाहिए।




