कुण्डलपुर (दमोह)। चातुर्मास के पावन अवसर पर आयोजित प्रवचन श्रृंखला में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि चातुर्मास केवल वर्षा ऋतु में एक स्थान पर निवास करने की परंपरा नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम, साधना और संस्कारों के जागरण का महापर्व है। इस अवधि में आने वाले प्रत्येक पर्व, कल्याणक और धार्मिक आयोजन भगवान महावीर, तीर्थंकरों एवं आचार्य परंपरा के आदर्शों से जोड़कर जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देते हैं।
पुण्य और श्रद्धा से मिलता है संतों का सान्निध्य
मुनि श्री ने भगवान महावीर के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि राजगृह के विपुलाचल पर्वत पर भगवान का समवसरण अनेक बार लगा। इसका कारण किसी का निमंत्रण नहीं, बल्कि वहाँ के भव्य जीवों का प्रबल पुण्य था। जहाँ श्रद्धा, भक्ति और पुण्य का वातावरण बनता है, वहाँ संतों का सान्निध्य सहज ही प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर से बार-बार जुड़ना भी किसी व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं था, बल्कि वहाँ के साधना अनुकूल वातावरण और श्रद्धालुओं की भावनाओं का परिणाम था। संत अपनी सुविधा नहीं देखते, वे वहीं प्रवास करते हैं जहाँ धर्म प्रभावना हो, साधना का वातावरण बने और समाज को आध्यात्मिक दिशा मिल सके।
संतों के चरणों से भूमि होती है पावन
मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि जिस भूमि पर संतों के चरण पड़ते हैं, वहाँ का प्रत्येक कण, वृक्ष और शिला भी पावन हो जाती है। संतों का सान्निध्य समाज में धर्म, संस्कार और आत्मकल्याण की भावना को जागृत करता है।
पिच्छी अहिंसा और जीवदया का उपकरण
दिगंबर परंपरा में पिच्छी की महत्ता समझाते हुए मुनि श्री ने कहा कि यह केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि अहिंसा और जीवदया का सर्वोत्तम उपकरण है। इसका उपयोग अत्यंत मर्यादा एवं शास्त्रीय नियमों के अनुसार किया जाता है। आहारचर्या के समय साधु विशेष सावधानी रखते हैं, ताकि किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचे।
उन्होंने बताया कि मयूरपंख की पिच्छी स्वाभाविक रूप से गिरे हुए पंखों से बनाई जाती है। यदि कहीं राष्ट्रीय पक्षी मयूर के साथ हिंसा होती है तो उसका कठोर विरोध होना चाहिए, लेकिन सहज रूप से प्राप्त पंखों से निर्मित पिच्छी का उपयोग दिगंबर परंपरा की प्राचीन एवं शास्त्रसम्मत व्यवस्था है।
व्यवहार में उतरे अहिंसा और करुणा
मुनि श्री ने कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप संवेदनशीलता, करुणा और आत्मसंयम है। केवल पूजा-अर्चना ही धर्म नहीं है, बल्कि अपने व्यवहार में अहिंसा, धैर्य, क्षमा और विवेक को उतारना ही सच्ची साधना है।
चातुर्मास आत्मविकास की आध्यात्मिक यात्रा
चातुर्मास की महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि यह काल एक आध्यात्मिक यात्रा के समान है। संस्कार शिविर, दशलक्षण महापर्व, दीक्षा दिवस, शरद पूर्णिमा और दीपावली जैसे पर्व साधकों को विभिन्न तीर्थों एवं महापुरुषों के जीवन से जोड़ते हैं।
उन्होंने कहा कि भगवान महावीर राजगृह से पावापुरी पहुँचे, लेकिन साधकों के लिए यह यात्रा केवल स्थानों की यात्रा नहीं, बल्कि आत्मा को राग-द्वेष से मुक्त करने की यात्रा है। पर्वों का स्मरण त्याग, तप, संयम और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
कर्म सिद्धांत को सरल भाषा में समझाया
प्रवचन के दौरान एक जिज्ञासा का समाधान करते हुए मुनि श्री ने कर्म सिद्धांत को सरल भाषा में समझाया। उन्होंने कहा कि अरिहंत भगवान अनंत सुख का अनुभव करते हैं, किंतु सिद्ध अवस्था प्राप्त होने तक वेदनीय कर्म का सूक्ष्म अस्तित्व रहता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे प्रखर प्रकाश के सामने मंद प्रकाश दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार शुभ कर्मों का प्रभाव इतना प्रबल होता है कि अशुभ कर्म प्रभावहीन हो जाते हैं। सिद्ध अवस्था में सभी कर्मों का पूर्ण क्षय होने पर आत्मा को अखंड, अबाध और अनंत सुख की प्राप्ति होती है। यही प्रत्येक जीव का अंतिम आध्यात्मिक लक्ष्य है।
प्रत्येक दिन को बनाएं आत्मविकास का अवसर
मुनि श्री ने श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि चातुर्मास के प्रत्येक दिन को आत्मविकास का अवसर बनाएं। धर्मसभा में नियमित उपस्थित हों, संस्कार शिविरों में भाग लें तथा अभिषेक, शांतिधारा, वंदना, स्वाध्याय और सेवा के माध्यम से पुण्य संचय करें।
उन्होंने कहा कि भगवान महावीर के अहिंसा, संयम और करुणा के संदेश को जीवन में उतारना आवश्यक है। जब व्यक्ति स्वयं बदलता है, तभी परिवार, समाज और राष्ट्र में सकारात्मक परिवर्तन आता है।
चातुर्मास में होंगे विविध धार्मिक आयोजन
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं कुण्डलपुर क्षेत्र प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि चातुर्मास के अंतर्गत प्रतिदिन धर्मसभा संपन्न हो रही है। आगामी समय में संस्कार शिविर सहित विविध धार्मिक आयोजन श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित होंगे।
देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु कुण्डलपुर पहुँचकर बड़े बाबा के दर्शन, अभिषेक, शांतिधारा, आहारचर्या, संत सान्निध्य एवं धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं। कुण्डलपुर तीर्थक्षेत्र कमेटी ने सभी धर्म श्रद्धालुओं से चातुर्मास के कार्यक्रमों में अधिकाधिक सहभागिता कर संयम, संस्कार और सेवा की इस पुण्यधारा से जुड़ने का आग्रह किया है।



