मुनिश्री सुधासागर जी इन दिनों कटनी क्षेत्र के बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्म प्रभावना के साथ मंगल संदेश से जैन जनमानस को सजग और उपकृत कर रहे हैं। भगवान आदिनाथ जी के जन्म कल्याणक पर भी उन्होंने जैन समाज को प्रभावी संदेश देकर भगवान आदिनाथ की शिक्षाओं का स्मरण करवाया। कटनी बहोरीबंद से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह खबर...
कटनी। मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने भगवान आदिनाथ के जन्म और तप कल्याणक का गूढ़ रहस्य बताया। उन्होंने धर्म सभा में कहा कि जब-जब हमें यह भाव आता है कि संसार का सबसे बड़ा धनी आदमी मैं बनूं समझ लेना तुमने संसार में सबसे बड़ा कंगाल बनने का बीज बो दिया। तुमने यह भाव किया कि संसार का सबसे बड़ा आदमी मैं बनूं यही कंगाली का लक्षण है। तुम्हारे मन मंे भाव आया कि मैं सबसे संसार का सबसे बड़ा ज्ञानी बनूं तो समझ लेना तुम संसार की सबसे बड़े मूर्ख बनोगे, तुमसे ज्यादा मूर्ख कोई नहीं होगा। तुम चाहते हो कि मेरा परिवार सबसे बड़ा हो, एक दिन तुम अकेले बचोगे। हर चीज में यह लगा लेना तुम संसार से आगे दौड़ना चाहते हो, सबसे बड़े पतन का कारण बनता है। किसी भी क्षेत्र में किसी को पीछे करके आगे आना यह पतन का लक्षण है, मन में भाव मत लाना, वचन व काया से भी नहीं। ये ‘सबसे’ शब्द खतरनाक है।एक काम करो ईष्या मत करो

हमारे विफल होने का कारण क्या है? हम अच्छा होना चाहते हैं, हो ही नहीं पा रहे। हम अच्छा सोचना चाहते हैं, सोच ही नहीं पा रहे। इन सबके पीछे एक शब्द की अपनी गलती हुई है। हमेशा हमने हर चीज के पीछे ‘सबसे’ शब्द लगा दिया, आज हमें आदिनाथ जयंती पर यह सबसे शब्द का त्याग करना है। स्पर्धा व ईष्या यह दोनों हमारे पतन का कारण बनते हैं। ईष्या में समाने वाले को रोक रहा है और स्पर्धा में वह उसको पीछे कर रहा है। ईष्या तो इतनी खतरनाक है कि स्वयं बढ़ने का भाव नहीं कर रहा है। ये क्यों बढ़ रहा है। मेरा सम्मान नहीं हो रहा है। इसका गम्य नहीं, इसका क्यों हो रहा है, इसको कभी जीवन में पनपने मत देना। तुम कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम एक काम करो- ईष्या मत करना। ईष्या ऐसी अग्नि है जो जलाकर भस्म कर देती है।

अधिक गुण लाओ तो जनता तुम्हारी जय करेगी

इसका विकल्प मत करो कि मैं जुगनू हूं। बस एक विकल्प छोड़ दो कि मैं कभी सूरज को हटाने का भाव नहीं करुंगा क्योंकि, यदि सूरज हट गया तो इस अंधकार को कौन संभालेगा। पहले उसके गुण सीखो कि यह बड़ा आदमी क्यों है, वे सारे गुण अपने में लाओ, बराबरी के बन जाओ, फिर हटाओगे तो जनता तुम्हारे लिए कुछ नहीं कहेगी, वो हट गया, ये आ गया और पूजा करवाना चाहते हो तो जिसको तुम हटाना चाहते हो, उसमें जितने गुण हैं। उससे अधिक गुण लाओ तो सारी जनता तुम्हारी जय जयकार करेगी।

पीछे करने का भाव मत करना

स्पर्धा करने से हमारा डाउनफॉल चालू हो जाएगा। जो हमारे पास ताकत है, यह भी हम खो देंगे, अभी हम चमक रहे हैं, हम जुगनू भी नही रहेंगे क्योंकि, हमने सूरज से स्पर्धा की है। कभी पुण्यात्मा को पीछे करने का प्रयास मत करना। जब तुम्हें महसूस हो कि सामने वाला हमसे बड़ा है, धन में, पद में, बल में, तप में किसी भी चीज में बड़ा है तो कभी उसको पीछे करने का भाव मत करना, उसका कुछ नही बिगड़ेगा। आगे बढ़ना है लेकिन सबसे आगे नहीं। अमीर बनना है सबसे ज्यादा अमीर नहीं, ज्ञानी बनना है लेकिन, सबसे ज्यादा ज्ञानी नहीं। यदि तुम सबसे आगे हो तो किसी दिन भीड़ तुम्हें तुम्हें कुचल देगी क्योंकि, तुम पुण्यात्मा को पीछे करके आगे आए हो। सावधान तुम ट्रॉले के आगे चल रहे हो।

सवाल यह कि तुमसे कितने लोग सुखी हैं 

सवाल यह नहीं है कि तुम सुखी हो? सवाल यह है कि तुमसे कितने लोग सुखी हैं। तुम कितने बड़े पापी बने रहना, तुम कितने ही गंदे बने रहना, मैं तुम्हें निकाल लूंगा बस एक ध्यान रखना- तुम्हारे पापी होने से कितने लोग पापी हो जाएंगे। तुम्हारे दुःखी होने से कितने लोग दुखी हो रहे हैं। तुम्हारे गलत रास्ते पर चलने से कितने लोग गलत रास्ते पर चले जाएंगे। बस अब हमारे पास कोई रास्ता नहीं, तुम पापी हो, बचा लूंगा लेकिन, तुम्हारे पाप से दूसरा भी पापी हो रहा है, अब नहीं बचोगे। तुम्हें गलत रास्ते पर जाना है तो पहले पीछे देखो, वो भीड़ तुम्हारे पीछे तो नहीं आएगी।

आदिनाथ भगवान कहते हैं कि तुम कितनों को ज्ञानी बना सकते हो

हमें मंजिल मिले या न मिले लेकिन, हमें मंजिल का रास्ता बनाना आना चाहिए। किसी को उठाकर मंजिल तक ले जाने की ताकत तुम में नहीं है, कम से कम जहां से तुम चलो, उस रास्ते को बना देना तो भी तुम तीर्थंकर कहलाओगे। तुम्हारे पास जो कुछ भी है उन चीजों से तुम कितनों को वो बना सकते हो जो तुम्हारे पास है। ज्ञान तुम्हारे पास है, आदिनाथ भगवान कहते हैं कि तुम कितनों को ज्ञानी बना सकते हो। जिनको तुम ज्ञान दोंगे, उसमे तुम्हारा अपमान होगा, तुम्हे नीचे उतरना पड़ेगा। तीर्थंकर कहते है यदि मेरे दीपक से किसी का दीपक जलता है तो मैं झुकने को तैयार हूं। ये प्रसंशनीय नहीं कि तुम्हारे पास दीपक है, ये बताओ इस दीपक से तुम कितने दीपक जला सकते हो।

जैनियों के यहां खेती जरूर होना चाहिए

यदि खेती करना पाप होता तो तीर्थंकर जैसी महान आत्माएं कभी खेती का उपदेश नहीं देती। उन्होंने खुद सिखाया। आज दुनिया में जितने बूचड़ खाने खुल रहे हैं, जितने नंदी कट रहे हैं, ये सब वो ही पापी हैं, जो खेती ट्रैक्टर से कर रहे हैं। तुम मात्र एकंेद्रियों को बचा रहे हो और सारे बैल कटने जा रहे हैं, बूचड़खाने। यदि हल से खेती होने लग जाए तो सारे बैल बच जाएंगे। आज गाय को पालने में सबसे बड़ा प्रश्न है कि बछड़े का क्या करेंगे तो उसके लिए खेती ही एक मात्र सहारा है। ऋषभदेव ने बैल का उपदेश इसलिए दिया है। अन्यथा ये बैल कटेंगे, वे अवधिज्ञानी थे गाड़ी का, ट्रेक्टर का उपदेश दे सकते थे। जैनियों के यहां खेती जरूर होना चाहिए या तो तलवार उठाओ या फिर हल उठाओ। जिंदगी में एक बार बैलगाड़ी से शिखरजी की वंदना करना और गाड़ी से जिंदगी भर की हजारों वंदना करना, वो एक वंदना श्रेष्ठ हैं, क्योंकि बैल की बचत है।