श्रमण संस्कृति के समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज कोई सामान्य संत नहीं थे। सारा देश 26 अक्टूबर शरद पूर्णिमा के दिन उनकी जन्म जयंती मना रहा है। वे श्रमण संस्कृति के महामहिम और अद्भुत गुरु मुनि ज्ञान सागर जी के अद्भुत शिष्य एवं लोक कल्याण की भावना से समृद्ध गांधीवादी और अहिंसा की विचारधारा से ओतप्रोत एक निर्भिमानी, निश्चछल एवं वीतरागता से विभूषित श्रमण संस्कृति की उस परमोज्वल धारा के ऐसे अप्रतिम प्रतीक थे, जो आज भी सिंधु घाटी की प्राचीनतम सभ्यता के रूप में अक्षुण होकर समस्त विश्व को अपनी गौरव गाथा सुना रही है।

पूरा परिवार श्रमण संयम मार्ग पर

10 अक्टूबर 1946 की शरद पूर्णिमा को कर्नाटक प्रांत के ग्राम सदलगा में श्रावक श्रेष्ठि पिताश्री मलप्पा जी अष्टगे एवं माता श्रीमंती अष्टगे के घर आंगन में जन्मे विद्याधर मात्र 22 वर्ष की अल्पायु में मुनि ज्ञानसागर जी से जैनेश्वरी दीक्षा लेकर विद्याधर से मुनि विद्यासागर बन गए थे। मलप्पा जी एवं श्रीमंती जी के गृहस्थ जीवन में बालक विद्याधर सहित महावीर, अनंतनाथ और शांतिनाथ ये चार पुत्र एवं सुवर्णा एवं शांता दो पुत्रियां भी थी, लेकिन यहां यह उल्लेख करना अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं होगा कि विद्यासागर जी के माता-पिता और तीनों भाइयों ने आचार्य श्री से मुनि दीक्षा एवं दोनों बहनों ने भी आर्यिका दीक्षा लेकर श्रमण संस्कृति को गौरवान्वित किया

पिता मलप्पाजी मुनि मल्लीसागर जी, माता श्रीमंती आर्यिका समयमति, भाई शांतिनाथ मुनि समय सागर जी, अनंतनाथ मुनि योग सागर जी एवं महावीर मुनि उत्कृष्ट सागर जी के रूप में आज भी श्रमण संस्कृति को गौरवान्वित कर रहे हैं।

पूरे परिवार का उल्लेख गिनीज बुक में दर्ज

बहन सुवर्णा एवं शांता ने भी आर्यिका दीक्षा ली थी लेकिन अपरिहार्य कारणों से उन्हें दीक्षा छेदना पढ़ी, और आज दोनों बहिने विदुषी ब्रह्मचारिणी के रूप में धर्म और अध्यात्म की सुरभि फैला रही हैं। आचार्य श्री के पूरे परिवार का उल्लेख गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किए जाने योग्य है। यह कैसा संयोग है कि परिवार के सभी सदस्यों का जैनेश्वरी दीक्षा लेना एवं रेयर आफ रेयरेस्ट (दुर्लभतम) एवं आश्चर्यजनक दूसरा उदाहरण है कि एक ही घर में, एक ही कोख से, एक ही तिथि शरद पूर्णिमा 27 अक्टूबर 1958 के दिन शांतिनाथ (आचार्य समयसागरजी) का जन्म होना।

पट्टाचार्य घोषित कर आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया

आचार्य श्री विद्यासागर जी के समाधिस्थ होने के पूर्व दिए गए आदेश एवं आज्ञा अनुसार मुनि समय सागरजी को जैन तीर्थ कुंडलपुर के बड़े बाबा की साक्षी एवं संपूर्ण संघ की सहमति एवं लाखों समाज जन की उपस्थिति में पट्टाचार्य घोषित कर आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया। आचार्य समय सागर जी विद्यासागर जी के समान उत्कृष्ट क्षयोपशमधारी, आगम अनुकूल चर्या का पालन करने वाले, एक सी सूरत, एक सी सीरत,एक सी चाल और एक सी ढाल वाले समय सागरजी के व्यक्तित्व में आचार्य विद्यासागर जी की छवि दिखाई देती है। दोनों महाश्रमणों के"अवतरण दिवस" पर कोटि-कोटि नमन