दिल्ली। ऋषभ विहार में विराजित दिगम्बर जैन पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन में संयम, आत्मसाधना, सदाचार और सकारात्मक चिंतन के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और यश को नष्ट करना भी गंभीर हिंसा के समान है।
वध से खतरनाक बदनामी
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने कहा कि वध यानी हत्या खतरनाक है, लेकिन किसी की बदनामी करना भी कम खतरनाक नहीं है। किसी के यश का नाश करना, उसे बदनाम करना और उसका अपयश फैलाना उसकी हत्या के समान है। वध भी हिंसक है और बदनामी भी हिंसक है। उन्होंने समाज में परस्पर सम्मान और सद्भाव बनाए रखने की प्रेरणा देते हुए कहा कि किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाले कार्यों से बचना चाहिए।
साधना में सुख, साधनों में नहीं
पट्टाचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य जितने अधिक साधन एकत्र करता जाएगा और जितना अधिक परिग्रह बढ़ाएगा, उतना ही उसके जीवन में कष्ट बढ़ सकता है। वास्तविक सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि आत्मसाधना और संयम-साधना में है। उन्होंने कहा कि जो साधन साधना में सहायक बनें, वही वास्तव में उपयोगी हैं। इसके विपरीत जो साधन साधना में बाधक बनें, उनसे दूर रहना चाहिए।
संयम है आत्मोत्थान का साधन
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने संयम को अनमोल बताते हुए कहा कि संयम ही सुख का साधन है और आत्मोत्थान का मार्ग प्रशस्त करता है। संयम के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन को अनुशासित कर आत्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
प्रशंसा मत चाहो, प्रशंसनीय बनो
उन्होंने कहा कि सज्जन व्यक्ति प्रशंसा पाने की इच्छा नहीं रखता, बल्कि अपने श्रेष्ठ पुरुषार्थ से प्रशंसनीय बनने का प्रयास करता है। नाम पाने के लिए कार्य नहीं करना चाहिए। अच्छे कार्य करते रहने से व्यक्ति का नाम और यश स्वयं स्थापित हो जाता है।
पट्टाचार्यश्री ने कहा कि मधुर वचन बोलें, परस्पर सहयोग करें, किसी को कष्ट न दें, बड़ों का आदर करें और छोटों के प्रति वात्सल्य रखें। गरीबों को भोजन और प्यासे को पानी देना चाहिए। सहयोग करने वाले को धन्यवाद देना तथा उपकारी के उपकार को स्वीकार करना चाहिए। जनक-जननी की सेवा भी जीवन का महत्वपूर्ण कर्तव्य है।
अच्छे गुण बनाते हैं प्रशंसनीय
पट्टाचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य के अच्छे गुण ही उसे वास्तविक रूप से प्रशंसनीय बनाते हैं। इसलिए बाहरी प्रशंसा की अपेक्षा अपने आचरण को श्रेष्ठ बनाने पर ध्यान देना चाहिए। सेवा, विनम्रता, सहयोग, कृतज्ञता और सदाचार जीवन को सार्थक बनाते हैं।
चिंता नहीं, चिंतन करो
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने श्रद्धालुओं को जीवन में चिंता छोड़कर चिंतन करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि देह का धर्म अलग है और आत्मा का धर्म अलग। इसी प्रकार शब्द ज्ञान और आत्मज्ञान में भी अंतर है।
उन्होंने कहा कि यदि जीवन में सुख-शांति प्राप्त करनी है तो चिंता के बजाय चिंतन को अपनाना चाहिए। चिंता चिता के समान कष्टकारी और भयंकर होती है। चिंता से शारीरिक बल, ज्ञान, रूप-सौंदर्य और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
आत्मचिंतन से जीवन में शांति
पट्टाचार्यश्री ने कहा कि चिंता छोड़कर आत्मचिंतन की ओर बढ़ना चाहिए। व्यक्ति जब अपने वास्तविक स्वरूप, जीवन के उद्देश्य और आत्मकल्याण पर विचार करता है, तब उसके भीतर विवेक और शांति का विकास होता है। आत्मसाधना, संयम और सदाचार ही जीवन को वास्तविक सुख की दिशा में ले जाते हैं।



