मुरैना। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में चातुर्मासरत ज्ञानरत्नाकर आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज के सान्निध्य में आयोजित धर्मसभा में साधु जीवन, गुरु श्रद्धा, धर्म आराधना और आत्मसाधना पर प्रेरणादायी संदेश दिया गया। इस अवसर पर मुनिश्री 108 उपशान्तसागर महाराज ने भी धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा और समर्पण बनाए रखने की प्रेरणा दी।

त्याग और आत्मसाधना है साधु जीवन की पहचान

आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने कहा कि सच्चे गुरु के प्रति पूर्ण और अटूट श्रद्धा होनी चाहिए। गुरु का जीवन साधक के लिए धर्म और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। सच्चे दिगम्बर साधु की पहचान बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि त्याग, तप, संयम, अहिंसा और आत्मसाधना से होती है।

उन्होंने दिगम्बर साधु के जीवन के चार प्रमुख लक्षण बताते हुए कहा कि नग्नत्व समस्त परिग्रह के त्याग का प्रतीक है। साधु संसार के बाहरी संग्रह और मोह से स्वयं को मुक्त करते हैं। केशलोंच शरीर के प्रति मोह और आसक्ति के त्याग का प्रतीक है।

पिच्छिका अहिंसा का माध्यम

आचार्यश्री ने दिगम्बर साधु के तीसरे लक्षण मयूर पिच्छिका धारण का उल्लेख करते हुए कहा कि पिच्छिका अत्यंत कोमल होती है और साधु के अहिंसा व्रत के पालन में सहायक होती है। इसके माध्यम से सूक्ष्म जीवों की रक्षा का भाव प्रकट होता है। उन्होंने बताया कि पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर महाराज भी पिच्छिका के महत्व को विशेष रूप से समझाया करते थे।

चौथे लक्षण के रूप में उन्होंने शरीर संस्कार रहित जीवन की चर्चा की। दिगम्बर साधु शरीर को सजाने-संवारने और सांसारिक शरीर-संस्कारों से दूर रहकर आत्मा की साधना में निरंतर लीन रहते हैं।

आत्मा की साधना ही साधु का उद्देश्य

अपने चातुर्मास का प्रसंग सुनाते हुए आचार्यश्री ने बताया कि बैतूल जिले के एक छोटे से गांव में एक व्यक्ति ने उनसे पूछा कि आप स्नान नहीं करते? इस पर उन्होंने स्पष्ट किया कि दिगम्बर साधु का जीवन शरीर के श्रृंगार और सुविधाओं में नहीं, बल्कि आत्मा की साधना, संयम और वैराग्य में लगा रहता है।

उन्होंने कहा कि साधु का उद्देश्य शरीर को सुख देना नहीं, बल्कि आत्मा को संसार के बंधनों से मुक्त करने का मार्ग प्रशस्त करना है। सच्चे गुरु की पहचान उनके बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि त्याग, तप, संयम, करुणा और आत्मानुशासन से होती है।

हर परिस्थिति में धर्म का आश्रय रखें

मुनिश्री 108 उपशान्तसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सुख हो या दुख, अमीरी हो या गरीबी, मनुष्य को हर परिस्थिति में धर्म को अंगीकार करके रखना चाहिए। परिस्थितियां कैसी भी हों, प्रभु का स्मरण, पूजा-पाठ और भक्ति नहीं छोड़नी चाहिए।

उन्होंने कहा कि सुख के समय धर्म को भूल जाना और दुख के समय ही प्रभु को याद करना सच्ची भक्ति नहीं है। मनुष्य को प्रत्येक परिस्थिति में प्रभु के प्रति श्रद्धा बनाए रखनी चाहिए। संकट के समय धर्म का आश्रय मानसिक शक्ति और सही दिशा प्रदान करता है।

धर्म जीवन को सही दिशा देता है

मुनिश्री ने कहा कि प्रभु के प्रति अटूट श्रद्धा और उनके बताए मार्ग पर चलने से जीवन में शांति, संयम और सद्भाव आता है। धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली साधना है।

उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति से दैनिक जीवन में धर्म, अहिंसा, संयम और सदाचार को अपनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया।

छात्रों को दी जा रही प्रवचन कला की शिक्षा

आचार्यश्री उदारसागर महाराज के सान्निध्य में जैन छात्रावास एवं जैन संस्कृत विद्यालय के छात्र प्रवचन कला का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। प्रतिदिन दोपहर में छात्र गुरुदेव के चरण सान्निध्य में एकत्रित होकर प्रवचन देने की कला की बारीकियां सीख रहे हैं।

आचार्यश्री उन्हें सरल भाषा में समझा रहे हैं कि प्रवचन की शुरुआत किस प्रकार की जाए, विषय को प्रभावी ढंग से श्रोताओं के समक्ष कैसे रखा जाए तथा बोलते समय भाषा, उच्चारण और प्रस्तुति का किस प्रकार ध्यान रखा जाए।

धर्म के साथ व्यक्तित्व विकास पर जोर

प्रशिक्षण के दौरान छात्रों को दृष्टांत के उचित प्रयोग, धार्मिक विषय को सरल एवं रोचक ढंग से प्रस्तुत करने तथा श्रोताओं की जिज्ञासाओं और शंकाओं का सहजता से समाधान करने की कला भी सिखाई जा रही है।

आचार्यश्री बच्चों को प्रवचन कला के साथ विषय की गहराई, आत्मविश्वास, शुद्ध उच्चारण, प्रभावी संवाद और धर्म के मर्म को समझने की प्रेरणा दे रहे हैं। छात्र उत्साहपूर्वक प्रशिक्षण प्राप्त कर सीखी हुई बातों का अभ्यास कर रहे हैं।

आचार्यश्री ने कहा कि बच्चों में बचपन से ही धार्मिक संस्कारों के साथ वक्तृत्व कला का विकास किया जाए तो वे भविष्य में धर्म, संस्कृति और समाज के लिए प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। यह प्रशिक्षण छात्रों के ज्ञानवर्धन के साथ उनके व्यक्तित्व विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।