मुरैना। आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज ने रक्षाबंधन पर्व के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन धर्म में रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का पर्व नहीं, बल्कि धर्म, संयम और साधु-संतों की रक्षा का पावन संकल्प दिवस है। यह पर्व हमें अपने भीतर धर्म की रक्षा करने और दूसरों के जीवन में भी धर्म की ज्योति प्रज्वलित करने की प्रेरणा देता है। आचार्यश्री ने कहा कि श्रावण मास की पूर्णिमा का यह दिन जैन परंपरा में एक ऐतिहासिक एवं प्रेरणादायी प्रसंग से जुड़ा हुआ है।

राजा बलि के अहंकार को शांत किया

प्राचीन काल में हस्तिनापुर में आचार्य श्री अकंपनाचार्य सहित 700 दिगंबर मुनिराजों पर राजा बलि आदि के मंत्रियों द्वारा घोर उपसर्ग किया गया। मुनिराजों ने अपने संयम, धैर्य और आत्मबल को नहीं छोड़ा। उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी धर्म और साधना का मार्ग नहीं त्यागा। इस संकट की घड़ी में महामुनि विष्णु कुमार ने अपनी ऋद्धि और तपोबल के माध्यम से उन साधु-संतों की रक्षा की तथा राजा बलि के अहंकार को शांत किया। उपसर्ग समाप्त होने के बाद मुनिराजों को विधिपूर्वक आहार कराया गया और श्रावकों ने इस मंगल प्रसंग पर हर्ष व्यक्त किया। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में जैन समाज में रक्षाबंधन पर्व को विशेष धार्मिक भावना के साथ मनाने की परंपरा चली आ रही है

क्रोध से धर्म की रक्षा नहीं होती

आचार्यश्री ने कहा कि आज हम रक्षाबंधन पर एक-दूसरे की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधते हैं, लेकिन हमें समझना चाहिए कि वास्तविक रक्षा सूत्र धागे का नहीं, बल्कि संकल्प का होता है। धागा कुछ समय बाद टूट सकता है, लेकिन धर्म के प्रति लिया गया संकल्प जीवनभर मनुष्य की रक्षा कर सकता है । क्रोध से धर्म की रक्षा नहीं होती, क्षमा से होती है। अहंकार से धर्म मजबूत नहीं होता, विनय से होता है। हिंसा से किसी की रक्षा नहीं होती, अहिंसा से होती है।

साधु की रक्षा का अर्थ उनके शरीर की रक्षा मात्र नहीं

मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि रक्षा का सबसे बड़ा अर्थ है-धर्म की मर्यादाओं की रक्षा। यदि हमारा आचरण ही धर्म के विपरीत है तो हाथ पर बंधा हुआ रक्षा सूत्र हमें धर्मात्मा नहीं बना सकता। रक्षा सूत्र हमें प्रतिदिन यह स्मरण कराए कि हम किसी जीव को पीड़ा नहीं देंगे, असत्य नहीं बोलेंगे, चोरी नहीं करेंगे, संयम और सदाचार का पालन करेंगे तथा साधु-संतों के प्रति श्रद्धा और विनय बनाए रखेंगे। भगवान महावीर की परंपरा में साधु-संत स्वयं किसी से अपनी रक्षा की अपेक्षा नहीं रखते। वे तो आत्मकल्याण और लोकमंगल के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं। साधु की रक्षा का अर्थ उनके शरीर की रक्षा मात्र नहीं, बल्कि उनके संयम, साधना और धर्ममार्ग के प्रति सम्मान की रक्षा करना है। श्रावक का कर्तव्य है कि वह साधु-संतों की वैयावृत्ति करे, उनके विहार और साधना में सहयोग दे तथा धर्म की प्रभावना में अपनी भूमिका निभाएं।

संसार में बाहरी सुरक्षा सीमित है

रक्षाबंधन का संदेश केवल इतना नहीं कि किसी की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध दिया जाए। इसका वास्तविक संदेश है कि हम अपने जीवन को ऐसा बनाएं कि हमारे कारण किसी जीव को भय न हो और हमारे आचरण से धर्म की गरिमा बढ़े। आज रक्षा सूत्र बांधने के साथ हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिएकृमैं किसकी रक्षा कर रहा हूं और मेरी रक्षा कौन कर रहा है? मुनिश्री ने कहा कि संसार में बाहरी सुरक्षा सीमित है, लेकिन आत्मा की वास्तविक रक्षा सम्यक् श्रद्धा, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् आचरण से होती है।

आचार्यश्री ने कहा कि आइए, इस रक्षाबंधन पर हम केवल कलाई पर धागा न बांधें, बल्कि अपने हृदय में धर्म का संकल्प बांधें। अहिंसा हमारी ढाल बने, संयम हमारा कवच बने, क्षमा हमारी शक्ति बने और जिनवाणी हमारा मार्गदर्शन बने। यही रक्षाबंधन पर्व की सच्ची सार्थकता और जैन दर्शन का वास्तविक संदेश है।

रक्षा बंधन विधान का हुआ भव्य आयोजन

नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज एवं मुनिश्री उपशांत सागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में श्री रक्षा बंधन विधान का आयोजन किया गया। श्री रक्षा बंधन विधान के शुभारंभ में श्री जिनेन्द्र प्रभु का जिनाभिषेक, शांतिधारा एवं नित्य पूजन किया गया। प्रतिष्ठाचार्य विद्वत नवनीत शास्त्री एवं मनोज शास्त्री ने श्री रक्षाबंधन महामंडल विधान का विधिविधान पूर्वक मंत्रोच्चारण के साथ संगीतमय पूजन के साथ मुनिराजों के अर्ध्य समर्पित कराए। 28 अगस्त को विधान की पूर्णाहुति, महाअर्घ्य के साथ विधान का समापन होगा। निग्रंथ महामुनिराज अकलंकाचार्य आदि 700 मुनिराजों की रक्षा से जुड़े महान पर्व श्री रक्षाबंधन के पुण्य अवसर पर इस विधान का आयोजन किया गया। आयोजन में परम पूज्य आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज, मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज, ऐलक उत्साहसागर,जी क्षुल्लक श्री उपकार सागरजी पूरे समय उपस्थित रहे।