घटते वन, असंतुलित प्रकृति, बढ़ती गर्मी, असामान्य मौसम को नियंत्रित करने के लिए वर्तमान में सघन पौधरोपण कर उनका पालन-पोषण से लेकर संरक्षण का संदेश जन-जन तक जाना चाहिए। अगर मानव जीवन को इस असंतुलन से बचाना है तो इस ओर भगवान तीर्थंकरों के प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण के संदेश को जीवन में उतारकर जगत कल्याण के लिए सहभागिता करनी होगी। इंदौर से पढ़िए, आज श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल की यह संयोजित खबर...
इंदौर। जैन धर्म ग्रंथों, शास्त्रों में पर्यावरण को लेकर बहुत लिखा गया है। दुनिया के लगभग सभी धर्मों की अपेक्षा सबसे अधिक जैन धर्म ने प्रकृति का महत्व समझा और सभी को उचित सम्मान दिया। पर्यावरण संरक्षण में जैन धर्मावलंबियों का उत्कृष्ट योगदान रहा है। प्रकृति के इसी प्रेम के चलते जैन धर्म के प्रमुख 24 तीर्थंकरों से जुडे़ हैं 24 ऐसे महत्वपूर्ण वृक्ष, जिना अधिक संख्या में धरती पर होना बहुत आवश्यक है। हालांकि वृक्ष किसी धर्म विशेष के नहीं होते, लेकिन कौन अधिक महत्व देता है वृक्षों को इससे उसकी प्रकृति के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी का पता चलता है। घटते वन, असंतुलित प्रकृति, बढ़ती गर्मी, असामान्य मौसम को नियंत्रित करने के लिए वर्तमान में सघन पौधरोपण कर उनका पालन-पोषण से लेकर संरक्षण का संदेश जन-जन तक जाना चाहिए। अगर मानव जीवन को इस असंतुलन से बचाना है तो इस ओर भगवान तीर्थंकरों के प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण के संदेश को जीवन में उतारकर जगत कल्याण के लिए सहभागिता करनी होगी।ये हैं तीर्थंकरों के 24 वृक्ष
भगवान ऋषभदेव जी का वृक्ष वटवृक्ष है। भगवान अजितनाथ जी का सर्प पर्ण वृक्ष, संभवनाथ जी का शाल वृक्ष, अभिनंदनजी का देवदार वृक्ष, सुमतिनाथ का प्रियंगु वृक्ष, पद्मप्रभुजी का प्रियंगु वृक्ष, चंद्रप्रभु जी का नाग वृक्ष, पुष्पदंत जी का साल वृक्ष, शीतलनाथ जी का प्लक्ष वृक्ष, श्रेयांसनाथ जी का तेंदुका वृक्ष, वासुपूज्यजी का पाटला वृक्ष, विमलनाथ जी का जंबू वृक्ष, अनंतनाथ जी का पीपल वृक्ष, धर्मनाथ जी का दधिपर्ण वृक्ष, शांतिनाथ जी का नंद वृक्ष, कुंथुनाथ जी का तिलक वृक्ष, अरहनाथ जी का आम्र वृक्ष, मल्लिनाथ जी का कुंप अशोक वृक्ष, मुनिसुव्रतनाथ जी का चंपक वृक्ष, नमिनाथ जी का वकुल वृक्ष, नेमिनाथ जी मेषश्रृंग वृक्ष, पार्श्वनाथ जी का घव वृक्ष तथा महावीर स्वामी का साल वृक्ष है। भगवान तीर्थंकरों ने इन्हीं वृक्षों के नीचे बैठकर तप, साधना और केवल्य ज्ञान प्राप्त कर जगत कल्याण का मार्ग बताया। आज भी इन्हीं पेड़ों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता।




