मुरैना। आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए वात्सल्य अंग की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वात्सल्य केवल किसी के प्रति प्रेम या मधुर व्यवहार का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्मा की निर्मलता और निष्कपटता से उत्पन्न होने वाला श्रेष्ठ भाव है। साधर्मियों के प्रति अंतरंग और बहिरंग दोनों रूपों में वात्सल्य होना चाहिए। जहां प्रेम में स्वार्थ, छल-कपट और दिखावा नहीं होता, वहीं वास्तविक वात्सल्य प्रकट होता है। तीर्थंकर प्रकृति का बंध 13वें गुणस्थान में होता है और उसके निर्माण में वात्सल्य भाव की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जिस प्रकार सूर्य की किरणों का स्पर्श होते ही सरोवर में कमल खिल उठता है, उसी प्रकार निर्मल वात्सल्य का स्पर्श आत्मा में श्रेष्ठ भावों को विकसित करता है। प्रेम में बहुत बड़ी शक्ति होती है, लेकिन वह प्रेम यथार्थ, पवित्र और निष्कपट होना चाहिए।
वात्सल्य में प्रेम के साथ विवेक भी जरूरी
आचार्यश्री ने भौंरे का उदाहरण देते हुए कहा कि भौंरा लकड़ी तक को छेदने की क्षमता रखता है, लेकिन कमल के प्रति ऐसा अनुराग हो जाता है कि उसकी पंखुड़ियों के बीच ही मस्त होकर रह जाता है। कमल बंद हो जाने पर भी वह उसे छोड़ना नहीं चाहता और इसी मोह में उसके प्राण तक चले जाते हैं। उन्होंने समझाया कि प्रेम आवश्यक है, लेकिन प्रेम के साथ विवेक का होना भी उतना ही जरूरी है। दो हिरणों का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि जंगल में दो मित्रों ने दो मृत हिरण देखे। पास में पानी उपलब्ध था। दोनों हिरण एक-दूसरे से कहते रहेकृ‘तू पानी पी ले, तू पानी पी ले।’ दोनों के मन में इतना प्रेम था कि एक-दूसरे को छोड़कर पानी पीने नहीं गए और अंततः दोनों ने प्राण गंवा दिए। आचार्यश्री ने कहा कि वात्सल्य में सामने वाले के सुख-दुःख की चिंता अपने समान होनी चाहिए, लेकिन ऐसा प्रेम विवेकपूर्ण होना चाहिए, जो दोनों के कल्याण का कारण बने।
कौए से सीखें मिल-जुलकर रहने की भावना
उन्होंने कहा कि कौआ जब भोजन प्राप्त करता है तो उसे अकेले नहीं खाता, बल्कि कांव-कांव करके दूसरे कौओं को भी बुलाता है। हमें भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। समाज में कौन सुखी है, कौन दुखी है, कौन आर्थिक या अन्य परेशानी में है, इसकी जानकारी रखना और जरूरतमंद के काम आना ही सच्चे वात्सल्य की पहचान है।
आचार्यश्री ने कहा कि समाज में किसी व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। साधर्मी के सुख में प्रसन्न होना और उसके दुःख में उसके साथ खड़ा होना ही साधर्मी वात्सल्य है। समाज को जोड़ने के लिए बड़े पद या धन की आवश्यकता नहीं, बल्कि निर्मल हृदय और आत्मीय व्यवहार की आवश्यकता है।
प्रेम से जीता जा सकता है मन
सुगनचन्द्र जी सेठ का प्रसंग सुनाते हुए आचार्यश्री ने बताया कि दिल्ली में एक सेठ के परिवार में विवाह का अवसर था। उन्होंने समाज के सभी लोगों के घर मिठाई भिजवाई। जब सेठ ने नौकर से पूछा कि सभी ने मिठाई स्वीकार कर ली है या नहीं, तो पता चला कि एक व्यक्ति ने मिठाई लेने से मना कर दिया है। सेठ स्वयं उसकी दुकान पर पहुंचे। वहां उन्होंने प्रेमपूर्वक रखे चने खाए और फिर कहाकृ‘अब हमारा व्यवहार हो गया है, आप मेरी मिठाई स्वीकार कर लीजिए। सेठ के इस आत्मीय व्यवहार ने उस व्यक्ति के मन को जीत लिया। आचार्यश्री ने कहा कि यही वास्तविक वात्सल्य है। वात्सल्य में अहंकार नहीं होता, अधिकार जताने की भावना नहीं होती, बल्कि सामने वाले के प्रति आत्मीयता और सम्मान होता है। प्रेम से वह काम हो सकता है जो दबाव और अधिकार से कभी नहीं हो सकता
निंदा सुनकर तत्काल निर्णय न लें
दो विद्वानों का प्रसंग सुनाते हुए आचार्यश्री ने कहा कि किसी व्यक्ति के संबंध में किसी दूसरे की बात सुनकर तत्काल निर्णय नहीं लेना चाहिए। एक सेठ के यहां दो विद्वान पहुंचे। एक के जाने के बाद दूसरे ने उसके संबंध में अपशब्द कहे और उसे ‘बैल’ बताया। दूसरे के जाने के बाद पहले ने भी उसकी निंदा करते हुए उसे ‘गधा’ कहा। सेठ ने दोनों की मानसिकता को समझ लिया और भोजन के समय एक के सामने भूसा तथा दूसरे के सामने चारा परोस दिया। इस प्रसंग के माध्यम से आचार्यश्री ने समझाया कि दूसरों की निंदा करने वाला व्यक्ति अंततः अपने ही व्यवहार से उपहास का पात्र बन जाता है। हमें किसी की बात सुनकर उसके प्रति दुर्भावना नहीं बनानी चाहिए। सत्य को समझने, परिस्थितियों को जानने और विवेकपूर्वक व्यवहार करने की आवश्यकता है।
यही वात्सल्य अंग की वास्तविक साधना
आचार्यश्री ने कहा कि वात्सल्य का अर्थ केवल मीठी बातें करना नहीं, बल्कि निष्कपट प्रेम, सहयोग, सम्मान, करुणा और आत्मीयता के साथ जीवन जीना है। साधर्मियों के प्रति ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट और दिखावे को छोड़कर एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनें। ऐसा वात्सल्य समाज को जोड़ता है, धर्म को मजबूत करता है और आत्मा को श्रेष्ठ भावों की ओर ले जाता है। यही वात्सल्य अंग की वास्तविक साधना है।





